– राकेश अचल
नया साल शुरू हो गया है, इस सदी का एक चौथाई हिस्सा काल के कराल गाल में समा चुका है। इस सदी को हम 21वीं सदी कहते हैं। इस सदी में नए भारत का एक क्यूट सपना एक क्यूट दिखने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देखा था। हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिन्होंने आधी 20वीं सदी और एक चौथाई 21वीं सदी देख ली।
मैं अपने तजुर्बे से कहना चाहता हूं कि मालिक! ये 21वीं सदी है- लेकिन कई बार लगता है कि सोच अब भी 19वीं में अटकी है। तकनीक (एआई) यानि कृत्रिम बौद्धिकता की, और दावे अंतरिक्ष के, और हरकतें… बैलगाड़ी वाली। इसीलिए तो सवाल बनता है- ये कौन सी सदी है मालिक! और जवाब हर दिन बदल जाता है। जबाब हर दिन बदलेगा। सत्ता प्रतिष्ठान सवालों का सामना किए बिना ही जबाब देगा। किंतु आप निराश मत होइए, सवाल करना मत छोड़िए, प्रश्नाकुलता को हर कीमत पर अक्षुण्ण रखिए।
प्रश्नाकुल समाज ही जीवित समाज होता है। जिस समाज के लोग प्रश्न करना छोड़ देते हैंं या प्रतिकार करना छोड़ देते हैं, उनका दमन होता है, शोषण होता है। मूकदर्शकों के समाज में शोषण संस्कार और भ्रष्टाचार संस्कृति बन जाती है। दुर्भाग्य से आज का दौर ऐसा ही प्रतिकारहीन और मूकदर्शक समाज है और इसका खमियाजा पूरा देश भुगत रहा है। हमसे गलती हो गई है, अब इसे सुधारने का समय है।
21वीं सदी का ये दौर 20वीं सदी के दौर से भी गया गुजरा है। 20वीं सदी में 19 महीने का आपातकाल लगा था। जेलें प्रतिपक्ष के नेताओं से भरी थीं, लेकिन जनता सड़कों पर उतरी और अंधियारे छंट गए थे। एक नया सियासी मजहब सबके सामने था। गठबंधन का मजहब अकबर के दीने इलाही की तरह ज्यादा नहीं चला। लेकिन मरा भी नहीं। आज भी मुल्क में गठबंधन की ही सरकारें चल रही हैं। केन्द्र में तो गठबंधन के साथ ही बैशाखियों की सरकार चल रही है।
नए साल में हम किसी को कोसने नहीं बैठे हैं। हम सब चाहते हैं कि सरकार चाहे जैसी हो, जनादेश की हो या धनादेश की। चुनी हुई हो या खरीदी हुई लेकिन भारत को भारत रहने दे। भारत को हिन्दू या मुसलमान मुल्क बनाने की कोशिश न करे। भारतीयों को भारतीय सरकार चाहिए न कि कोई हिन्दू या इस्लामिक सरकार।
उम्मीद है कि आप मेरे इस दर्शन से सहमत होंगे। न भी हों तो और भी अच्छा। क्योंकि असहमति और प्रश्नाकुलता ही लोकतंत्र का सौंदर्य है। अलंकार है, आभूषण है। बुरी बात ये है कि पिछले एक दशक में प्रश्नाकुलता की योजनाबद्ध तरीके से हत्या की जा रही है। उसके ऊपर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं। नए साल में नई प्राथमिकताओं की जरूरत है। मुल्क को मन्दिर, मस्जिद, चर्च और नए गुरुद्वारों की जरूरत नहीं है। मुल्क की जरूरत अस्पताल, स्कूल, विज्ञान केन्द्र हैं।
बहरहाल आज भाषणों का दिन नहीं है। आज उदार मन से शुभकामनाएं देने और लेने का दिन है। नए साल को हिन्दू, मुसलमान या ईसाई बनाने की जरूरत नहीं है। बहुत से लोग हैं जो नया साल नहीं मनाते। वे चैत्र मास की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे लोगों से कोई पूछे कि उनके जन्म प्रमाण पत्र में क्या कोई मजहबी तारीख, तिथि दर्ज हैं? बहुत-बहुत शुभकामनाएं।


