भिण्ड, 12 फरवरी। जिले के अटेर क्षेत्र के ग्राम चौकी में संतोषी माता मन्दिर प्रांगण में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में गुरुवार को कथा व्यास 1008 महामंडलेश्वर रामभूषण दास महाराज ने कृष्ण रुक्मणि विवाह का मनमोहक वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि भीष्मक का बड़ा पुत्र रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था। वह बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था, रुक्मी ने अपनी मनमानी करके किसी की भी बात नहीं सुनते हुए रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ ही करने का निश्चय किया था। उसने शिशुपाल के पास संदेश भेजकर विवाह की तिथि भी निश्चित कर दी। रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा तो वह बड़ी दुखी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए देवी रुक्मणि ने एक ब्राह्मण को द्वारिका भगवन श्रीकृष्ण के पास भेजा। संदेश में लिखा था कि हे नंद-नंदन! आपको ही पति रूप में वरण किया है। मैं आपको छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। मेरे पिता मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहते हैं। विवाह की तिथि भी निश्चित हो गई। रुक्मिणी का संदेश पाकर श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर शीघ्र ही कुण्डिनपुर की ओर किसी को भी बिना बताए चल दिए। श्रीकृष्ण के चले जाने पर पूरी घटना की सूचना बलराम को मिली तब वे यादवों की सेना के साथ कुण्डिनपर के लिए चले। उधर, भीष्मक ने पहले ही शिशुपाल के पास संदेश भेज दिया था। अंत में शिशुपाल निश्चित तिथि पर बहुत बड़ी बारात लेकर कुण्डिनपुर जा पहुंचा।
रुक्मिणी विवाह के वस्त्रों में सज-धजकर गिरिजा के मन्दिर की ओर चल पड़ी। वह अत्यधिक उदास और चिंतित थी। रुक्मिणी ने गिरिजा की पूजा करते हुए उनसे प्रार्थना की- ‘हे मां। तुम सारे जगत की मां हो! मेरी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं करना चाहती।’ रुक्मिणी जब मन्दिर से बाहर निकली तो उसे वह ब्राह्मण और श्रीकृष्ण भगवान दिखाई दिए। तब श्रीकृष्ण देवी रुक्मणि को रथ में बिठाकर तीव्र गति से द्वारका की ओर चल पड़े। क्षण भर में ही संपूर्ण कुण्डिनपुर में खबर फैल गई कि श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करके उसे द्वारकापुरी ले गए। शिशुपाल के कानों में जब यह खबर मिली तो वह उनकी सेनाओं के साथ श्रीकृष्ण का पीछा किया, किंतु बीच में ही बलराम और यदुवंशियों ने शिशुपाल आदि को रोक लिया। भयंकर युद्ध हुआ। रुक्मी यह सुनकर क्रोध से कांप उठा। उसने बहुत बड़ी सेना लेकर श्रीकृष्ण का पीछा किया। उसने प्रतिज्ञा की कि वह या तो श्रीकृष्ण को बंदी बनाकर लौटेगा, या फिर कुण्डिनपुर में अपना मुंह नहीं दिखाएगा। रुक्मी और श्रीकृष्ण का घनघोर युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध में रुक्मी पर सुदर्शन चक्र चलाने ही वाले थे की बहन रुक्मणि ने रुक्मी को बचा लिए और श्रीकृष्ण देवी रुक्मणि के साथ द्वारिका लौट आए।
कथा के मध्य विलाव धाम से शाला वाले महाराज, पृथुवन महाराज मसूरी धाम, मिहोनी शाला वाले महाराज, मां काली आश्रम बबेड़ी वाले महाराज सहित तमाम संतों का आगमन हुआ।
Sunday, February 15
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