– राकेश अचल
डर तो था ही, आशंका भी थी और बीते रोज आशंका हकीकत में बदल गई। अदावत, नफरत और अहंकार ने सियासत के साथ ही संसद को भी बेपटरी कर दिया। संसद में सरकार ने लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया तो विपक्ष के डर से विश्वगुरू भी संसद में बोलने का साहस नहीं जुटा पाए और सदन में आए ही नहीं।
संसद में ऐसा मंजर 22 साल पहले आज की सत्तारूढ़ भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के सामने पैदा किया था। लेकिन तब और अब में अंतर ये है कि डॉ. मनमोहन सिंह सदन से भागे नहीं थे, जबकि नरेन्द्र मोदी डर के मारे लोकसभा में आए ही नहीं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिडला ने कुछ अप्रिय होने की आशंका के चलते खुद प्रधानमंत्री को सदन में न आने का मश्विरा दिया। भारत की राजनीति में वैमनस्य के बीज बोने वाली भाजपा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी को अबोध बालक समझ लिया था उसी की अगुवाई में समूचा विपक्ष ने महाबली प्रधानमंत्री को भयभीत कर देगा। भयभीत प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति के अभिभाषण धन्यवाद प्रस्ताव पर उत्तर देने के लिए उच्च सदन में जाना पड़ा, जिसके वे सदस्य नहीं हैं। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इतना असहाय देखकर दुखी हूं। मैंने इतना असहाय और भगोड़ा पंत प्रधान आज तक नहीं देखा।
दुख की बात ये है कि 11 साल हो गए, किंतु प्रधानमंत्री मोदी के सिर से नेहरू और इन्दिरा गांधी का भूत उतर ही नहीं रहा। मेरा अनुभव है कि जब तक सिर पर चढ़ा भूत उतरता नहीं है तब तक कोई आम आदमी हो या मोदी जी सामान्य व्यवहार नहीं कर सकते। पिता-पुत्री की उपलब्धियों और नाकामियों की आड़ लेकर मोदी जी महान नहीं बन सकते। ये हकीकत बताने वाला भाजपा और आरएसएस में एक भी नेता नहीं हैं। ऐसे में मोदी जी को किसी झाड़ फूंक करने वाले ओझा की मदद नि:संकोच ले ही लेना चाहिए। देश की सियासत और संसद को बेपटरी का गुनाह सत्तारूढ़ दल का है। प्रतिपक्ष को भी निर्दोष नहीं कहा जा सकता। पर सवाल ये है कि विपक्ष कब तक उपेक्षित रहकर सरकार का सहयोग कर सकता है। सरकार चाहती ही नहीं कि विपक्ष को विपक्ष बने रहने दिया जाए। न कभी आपस में औपचारिक, अनौपचारिक बैठकें, न चायपान, न राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार विमर्श। केवल और केवल अपमान करने से सौजन्य नहीं पनपता।
संसद का बजट सत्र चल रहा है और मुझे आशंका है कि संसद शायद ही सुचारु रूप से चल पाए। संसद को बेपटरी होने से रोकने की पहली जिम्मेदारी लोकसभा अध्यक्ष और संसदीय कार्यमंत्री की होती है। दोनों ही अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। ऐसे में एक ही विकल्प बचता है कि सरकार लोकसभा अध्यक्ष और संसदीय कार्यमंत्री को तत्काल बदल दे। यदि ऐसा न किया गया तो एक न एक दिन संसद का भट्टा बैठ जाएगा। जो अभी तक नहीं हुआ। बिना विपक्ष के संसद चलाना, विधि विधायी कार्य बिना बहस ध्वनिमत से करना बीमारी का इलाज नहीं है, सरकार को ये सच समझना पड़ेगा। सरकार, कांग्रेस को खलनायक मान सकती है, किंतु कांग्रेस के बहाने पूरे विपक्ष की अनदेखी और अवमानना का हक सरकार को भी नहीं है। सरकार यदि हठधर्मी दिखाएगी तो विपक्ष भी शायद ही पीछे हटे और इसका खमियाजा भुगतेगा पूरा देश।
राजनीति में पक्ष-विपक्ष की ही नहीं लोकसभा अध्यक्ष और संसदीय कार्यमंत्री के कर्तव्य साफ लिखे हैं। इनमें अगर कोई कोताही होती है तो संसद की सेहत प्रभावित होती है। संसद को त्वरित उपचार की जरूरत है। यदि संसद बीमार होती है तो लोकतंत्र भी स्वस्थ्य नहीं रह सकता। आज भारत की सियासत उस मुकाम पर आ चुकी है जहां यदि अदावत समाप्त न की गई तो अराजकता जन्म ले सकती है।


