– राकेश अचल
कल तो मैं देश की न्यायपालिका के नीर-क्षीर विवेक का कायल हो गया। मुझे शब्द नहीं मिल रहे न्यायपालिका के कसीदे काढ़ने के। देश की सबसे बड़ी अदालत ने जिस तरह से यूजीसी नियमों को लेकर देश के सवर्णों की भावनाओं की कद्र की है, उससे सवर्णों की न्यायपालिका के प्रति आस्था बढ़ी होगी।
देश की न्यायपालिका 150 करोड़ आबादी के संवैधानिक हको-हकूक की निगेबान है। न्यायपालिका दिन-रात काम करती है तब भी देश की सबसे बड़ी अदालत में 90 हजार मामले लंबित हैं। इतने दबाब के बीच न्यायलय ने यूजीसी के नए नियमों के अमल पर फरी तौर पर स्थगन आदेश जारी कर जहां एक ओर सरकार का सिरदर्द कम किया है, वहीं देश के उन बहुसंख्यक सवर्णों को भी राहत दी है जो सोच रहे थे कि यूजीसी के नियमों से आसमान टूट पड़ेगा।
मैंने आज तक कभी किसी कानून या नियम के बनने से आसमान टूटते नहीं देखा। देखा भी है तो कानूनों का विरोध करते लोगों पर पुलिस की लाठी को टूटते हुए। लेकिन इस बार यूजीसी नियमों का विरोध करने वाले और प्रधानमंत्री को लेकर जातिगत नारे लगाने वालों के विरुद्ध ये लाठियां भी अनुआं करती नजर आई। किसी के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, अन्यथा प्रधानमंत्री जी के उपनाम (सरनेम) का इस्तेमाल करने पर लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी के ऊपर तो मुकदमे लाद दिए गए थे।
मुख्य न्यायाधीश ने यूजीसी के नए नियमों के अमल पर रोक लगाते हुए जो टिप्पणियां की हैं वे काबिले गौर भी हैं और काबिले तारीफ भी। अदालत ने जाति विहीन समाज का जिक्र किया। जरूरत थी इसकी, क्योंकि भारत में जाति और जाति व्यवस्था एक वास्तविकता है। प्रधानमंत्री से लेकर प्रधान संतरी तक की जाति उनके नामों के पीछे फेवीकोल के जोड़ की तरह चस्पा है। माननीय मी लॉर्डस के नामों से भी उनकी जातियों को आसानी से पहचाना जा सकता है।
जाति विहीन समाज दुनिया में जहां हैं, वहां समरसता भी है और बराबरी भी। लेकिन भेद की अकेली वजह जाति नहीं है। रंग भी है जिसे आप वर्ण भी कह सकते हैं। लिंगभेद तो है ही। कहीं किसी रूप में तो, कहीं किसी रूप में। हमारे यहां जाति और वर्ण व्यवस्था सनातन है, हमारे लोकतंत्र पर भी जाति और वर्ण की काली छाया शुरू से है। इस छाया से लोकतंत्र को मुक्त कराने का मसला भी बहुत पुराना है। लौटकर यूजीसी के नए नियमों पर आते हैं। इन नियमों से न शिक्षा जगत में पिछड़े, अजा, अजजा के लोग पूरी तरह सुरक्षित हो जाते और न सारे सवर्णों पर गाज गिरने वाली थी। लेकिन हौवा ऐसा खड़ा किया गया कि सरकार और सरकारी पार्टी दोनों हिल गए। भला हो कि इस आग को बुझाने की पहल सुप्रीम कोर्ट ने बिना देर किए की और स्थगन आदेश जारी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से जो आग सुलगी थी वो फैल नहीं पाई। सवर्ण खुश, सरकार खुश, अखबार खुश, सभी को इतनी खुशी मिली है जो कि दामन में नहीं समा रही। अदालत के इस फैसले से लद्दाख के लोगों को जरूर निराशा हुई होगी, क्योंकि उनके सोनम वांग्चुक की रिहाई का मामला बड़ी अदालत ने अभी तक नहीं सुलझाया है। अब अदालत की अपनी सीमाएं हैं, प्राथमिकताएं हैं। हमें उम्मीद करना चाहिए कि हमारी न्यायपालिका विधि-विधान के साथ ही संविधान और जन भावनाओं को भी अपने फैसलों का आधार बनाती रहे।


