– राकेश अचल
एक जमाने में प्रतिकार का प्रमुख नारा था- जो हमसे टकराएगा, मिट्टी में मिल जाएगा। वक्त के साथ बहुत सी चीजें बदलती हैं, ये नारा भी बदल गया। अब प्रतिकार अपराध है, इसलिए आप इस तरह के नारे शायद ही सुनते हों। अब इस नारे को सरकार ने हथियार लिया है। अब पुराना नारा बदल गया है, अब सरकारी नारा है- जो हमसे टकराएगा, मिट्टी में मिल जाएगा।
आज के दौर में प्रतिकार की मुमानियत है। प्रतिकार एकाधिकार की सबसे बड़ी बाधा है, इसीलिए सरकार हर प्रतिकार को पूरी ताकत से कुचलती ही नहीं अपितु मिट्टी में मिला देती है। सरकार को किसी भी प्रकार का प्रतिकार पसंद नहीं। सरकार प्रतिकर विहीन समाज और देश चाहती है। धीरे-धीरे प्रतिकर स्वत: कुंठित होता जा रहा है। आज कल सरकार के निशाने पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के निशाने पर सरकार। दोनों एक-दूसरे की मिट्टी पलीत करने में लगे हैं। सरकार तो सरकार होती है। टकराव से बिल्कुल नहीं डरती, उल्टे प्रतिकार करने वालों को भयभीत करती है। प्रतिकारकर्ता का समर्थन कमजोर करती है, समाज को दो भागों में बांट देती है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में मौनी अमावस्या को गंगास्नान के दौरान प्रशासन द्वारा किए गए कथित दुर्व्यवहार के विरोध में अनशन पर हैं। उप्र की सरकार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की हेंकड़ी निकालने के मूड में है। हिन्दुत्व की वैश्विक ठेकेदार आरएसएस ने भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को आदतन और इरादतन सरकार विरोध करने मान लिया है। ये बात और है कि इस मुद्दे पर स्वामीजी के समर्थकों की संख्या भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। प्रतिकार और अनशन से सत्ता डरती नहीं। कांग्रेस के जमाने में स्वामी निगमानंद सारस्वती गंगा से अवैध बालू उत्खनन और गंगा प्रदूषण के विरोध में भूख हड़ताल करते हुए लगभग 114 दिनों के उपवास के बाद 13 जून 2011 को चल बसे थे। लेकिन समाज मौन रहा।
भाजपा की मौजूदा सरकार के समय भी भारत के प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् और पूर्व आईआईटी प्रो. जीडी अग्रवाल जिन्होंने गंगा को स्वच्छ और मुक्त-प्रवाह बनाए रखने के लिए फास्ट-टू-डेथ आंदोलन किया और 111 दिनों के उपवास के बाद 11 अक्टूबर 2018 को चल बसे। लेकिन सरकार नहीं पिघली। मुझे लगता है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में भी सरकार टस से मस होने वाली नहीं है। क्योंकि उसे पता है कि देश का हिन्दू समाज विभाजित है, इसलिए कुछ होने वाला नहीं है।
सरकार से टकराकर पूर्व केन्द्रीय मंत्री लालू यादव, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, झारखंड के हेमंत सोरेन की मिट्टी पलीत हो चुकी है। उप्र के नबाब आजमखान, बहन मायावती, उड़ीसा के नवीन पटनायक अपनी मिट्टी पलीत करा चुके हैं। अब नंबर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का है। सरकार स्वामी जी को नकली और जिद्दी शंकराचार्य साबित करने पर आमादा है। असली-नकली का फैसला धर्म संसद को नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट को करना है, इसलिए आप अनुमान लगा सकते हैं कि फैसला किस तरह का आएगा?
सत्ता अपना-पराया नहीं देखती। सामने खड़े होने वाले किसी को नहीं बख्शती, फिर चाहे उमा भारती हों या गोविंदाचार्य, सुरेश सोनी हों। अब कैलाश विजयवर्गीय सरकार के निशाने पर हैं। पार्टी के निर्देश पर मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनसे गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण का अधिकार छीन लिया, मजबूरन उन्हें कोपभवन में जाना पड़ा। कुल मिलाकर बात ये है कि जिसे अपनी मिट्टी पलीत कराना हो वो सरकार से टकरा जाए। मिट्टी अपने आप पलीत हो जाएगी।


