– राकेश अचल
मप्र की सरकार ने लगता है बदजुबान मंत्री विजय शाह के मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। लगता है कि शाह प्रकरण में सरकार को अदालत का भी भय नहीं है। विजय शाह पर सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन कहने का आरोप है।
विजय शाह सात बार के विधायक हैं, अजेय हैं, लेकिन बदजुबान भी हैं। उनकी बदजुबानी के एक नहीं, अनेक किस्से हैं। लेकिन लपेटे में वे पहली बार आए हैं। मप्र हाईकोर्ट ने शाह के खिलाफ एफाईआर दर्ज करने और मामले की जांच एसआईटी से कराने के निर्देश दिए तो वे त्राहिमाम करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। उन्होंने माफी भी मांग ली। शाह प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली, उल्टे सरकार को फटकार मिली। सरकार एसआईटी रिपोर्ट मिलने के बाद भी शाह के खिलाफ मुकद्दमा चलाने की इजाजत नहीं दे रही है। सरकार ने एसआईटी के आवेदन पर फैसला ही नहीं किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फैसला करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
सवाल ये है कि सरकार आरोपी मंत्री की ढाल क्यों बनी हुई है? क्या शाह के खिलाफ प्रकरण दर्ज होने से भाजपा की मोहन सरकार अल्पमत में आ जाएगी? क्या शाह के इस्तीफे की स्थिति में मप्र के आदिवासी भाजपा का साथ छोड़ देंगे? शायद ऐसा कुछ भी न हो, किंतु सरकार है कि शाह को बचाने पर अड़ी हुई है। सवाल ये भी है कि क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शाह के लिए सुप्रीम कोर्ट का कोप भाजन बनने का जोखिम उठा सकेंगे।
मप्र सरकार के बदजुबान मंत्रियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और कैलाश विजयवर्गीय जैसे मंत्रियों के नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल हैं। खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की जुबान और जबान अक्सर फिसलती रहती है। मंत्रियों के देखादेखी अब सरकार के आला अफसरों की जुबान भी बद होती जा रही है। अब तो लगता है जैसे भाजपा और कांग्रेस में बदजुबानी की होड़ चल रही है।
कांग्रेस विधायक इंजीनियर फूलसिंह बरैया के सवर्ण और नारी विरोधी बयान कांग्रेस को मुसीबत में डाले हुए हैं। बरैया के खिलाफ भाजपा के संगठन तो प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही। विधायक और मंत्री की बदजुबानी के साथ ही आईएएस अफसर संतोष वर्मा की बदजुबानी भी सरकार की मुसीबतों को बढ़ा चुकी है। आने वाले दिन मप्र के लिए कठिन हैं। ये कहना कठिन है कि मंत्री विजय शाह गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण कर पाएंगे या नहीं? भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का इस मामले में क्या रुख रहता है। वे भी सरकार के साथ खड़े होंगे या नहीं, कह पाना कठिन है। दो हफ्ते बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।


