– राकेश अचल
मेरे सामने 1990 में पहली बार विधायक बने डॉ. नरोत्तम मिश्रा को विधानसभा से बाहर रहते हुए दो साल पूरे हो गए हैं। उन्हे पुन: विधानसभा में प्रवेश के लिए अभी तीन साल और प्रतीक्षा करना पड़ेगी। 2028 में मप्र विधानसभा के लिए जब चुनाव होंगे उस समय डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पार्टी टिकट देगी या नहीं ये कहना मुश्किल है। इसलिए डॉ. मिश्रा आज-कल अपनी घरेलू राजनीति पर ध्यान दे रहे हैं।
आपको याद होगा कि अजेय माने जाने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा पिछला विधानसभा चुनाव दतिया से हार गए थे। तबसे अब तक पार्टी ने उनका पुनर्वास नहीं किया है। मप्र भाजपा अध्यक्ष के लिए भी उनका नाम जोर से चला किंतु लॉटरी खुली हेमंत खंडेलवाल के नाम। अब डॉ. मिश्रा के सामने अपने भविष्य के साथ ही अपने बेटे सुकर्ण के राजनीतिक भविष्य का भी सवाल है। नरोत्तम मिश्रा भविष्य में खुद चुनाव लड़े या अपने बेटे को चुनाव लड़ाएं, लेकिन उन्हें जाना दतिया ही पड़ेगा। दतिया ने उन्हें नहीं, बल्कि उनके दंभ को ठुकराया था। उनके आतंक को ठुकराया था। मुझे लगता है कि पिछले दो साल में जिस तरह दतिया का विकास ठिठका है उसे देखते हुए जनता उन्हें दोबारा मौका दे सकती है। लेकिन अब जब अगला चुनाव होगा तब तक क्या कुछ बदल चुका होगा, कहना कठिन है।
खबरें बताती हैं कि राजनीति में अप्रासंगिक होने से बचने के लिए डॉ. नरोत्तम मिश्रा धर्माचरण का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने अपने गृह नगर डबरा में नवगृह मन्दिर बनवाया है। इस मन्दिर के जरिये वे जनता के साथ ही अपनी पार्टी में भी जगह बनाना चाहते हैं। इस समय वे अपने पुत्र के साथ पूरे समय धर्माचरण कर रहे हैं। वे पीताम्बर धारण कर रहे हैं तो उनका बेटा भगवा धारण किए नजर आ रहा है। भाजपा में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री काल में संकटमोचक की छवि बनाने वाले डॉ. मिश्रा यदि चुनाव न हारते तो उन्हें अर्श से फर्श पर न आना पड़ता। उन्होंने विधायक और मंत्री रहते हुए यश, वैभव जितना कमाया उतना मप्र के किसी और भाजपा विधायक के हिस्से में नहीं आया, फिर भी वे भाजपा के गोपाल भार्गव नहीं बन सके। मुमकिन है कि मिसुर जी को अपनी गलती का अहसास हो गया हो, इसीलिए उन्होंने धर्म की राह पकड़ी है।
उल्लेखनीय है कि भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व के दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं। डॉ. नरोत्तम मिश्र से पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा को साजिशन बेपटरी किया जा चुका है, जबकि वे एक विधायक और मंत्री के तौर पर डॉ. नरोत्तम मिश्र से इक्कीस बैठते हैं। उन्हें चुनावों में पराजय का सामना भी करना पड़ा और पार्टी नेतृत्व की उपेक्षा का भी। वे भी नरोत्तम मिश्रा की तरह धार्मिक हैं। उन्होंने भी ग्वालियर में लक्ष्मी मन्दिर की स्थापना के अलावा कुछ भगवान परशुराम के मन्दिर बनवाए। भाजपा में डॉ. नरोत्तम मिश्रा, अनूप मिश्रा की ही तरह बुंदेलखण्ड में सर्वाधिक जमीनी नेता गोपाल भार्गव भी भाजपा की अंदरूनी ब्राह्मण विरोधी राजनीति के शिकार हो चुके हैं। अजब संयोग है कि एक समय में इन तीनों के नाम भावी मुख्यमंत्री के तौर पर सुर्खियों में आए किंतु किस्मत और पार्टी नेतृत्व ने इन तीनों का साथ नहीं दिया। आने वाले दिनों में भी ब्राह्मण नेतृत्व के लिए अवसर सीमित बचे हैं।
मजे की बात ये है कि ग्वालियर की राजनीति में एक समय अन्ना, गन्ना और मुन्ना के रूप में चर्चित अनूप मिश्रा, डॉ. नरोत्तम मिश्रा और विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर धीर-गंभीर होते हुए भी लगातार क्षीण हो रहे हैं। तीनों अपने वजूद और विरासत को लेकर चिंतित हैं। तीनों के सामने अपने उत्तराधिकारियों को राजनीति में स्थापित करने की चुनौती है। अब देखना है कि फिलहाल क्या नवगृह मन्दिर डॉ. नरोत्तम मिश्र के ग्रह और दशा बदलने में सहायक होता है या नहीं?


