– राकेश अचल
भारत की सनातनी, हिन्दुत्व को समर्पित सरकार औपनिवेशक काल के चिन्हों को समाप्त करे तो एक बात है, लेकिन यदि सरकार सनातनी और पौराणिक संदर्भों के प्रतीक काशी के मणिकर्णिका घाट पर बुलडोजर लेकर चढ़ बैठे तो हैरानी होती है। समझ में नहीं आता कि सरकार की इस कार्रवाई का समर्थन किया जाए या विरोध? काशी यानि वाराणसी पंतप्रधान भाई नरेन्द्र दामोदर दास मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है। काशी में पिछले एक दशक से मोदी जी की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं खड़कता, इसलिए इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्राचीन मणिकर्णिका घाट को कॉरिडोर में बदलने के लिए की गई तोड़फोड़ मोदी की सहमति से ही की गई है। कोरीडोर प्रेमी मोदी जी इससे पहले बाबा विश्वनाथ मन्दिर के आस-पास भी कोरीडोर बनवा चुके हैं।
मणिकर्णिका घाट कोरीडोर के निर्माण के क्रम में घाट पर नीचे मौजूद कुछ दिन पूर्व बुलडोजर से मूर्ति और मन्दिर तोड़े जाने पर मंगलवार को पाल समाज आक्रोशित नजर आया। समिति के महेन्द्र पाल अपने साथियों के साथ घाट पहुंचे और अहिल्या बाई की मूर्ति तोड़े जाने का विरोध करने लगे। मौके पर भीड़ एकत्र होने लगी। मौके पर एडीएम समेत एसीपी मय फोर्स पहुंचे लोगों कों वहां से बाहर किया गया। इस पर पाल समाज के अध्यक्ष महेन्द्र पाल पिंटू ने कहा कि विकास के नाम पर धरोहर कों हटाया जा रहा है जो गलत है। घाट के चच्छन गुरू ने कहा कि विकास के नाम पर घाट का अस्तित्व खत्म किया जा रहा है। घाट के पास रहने वाले कुछ लोगों ने रोजी रोटी छीनने का भी आरोप लगाया है। घाट पुरोहितों ने आरोप लगाया कि मणिकर्णिका घाट सहित शिवलिंग और रानी अहिल्याबाई की मूर्ति तोड़ी गई है। विकास कार्यों की जद में मूर्तियां और मन्दिर तोड़ना कहीं से भी उचित नहीं है। मणिकर्णिका घाट पर एक नहीं, अनेक प्राचीन मन्दिर हैं। जो न अंग्रेजों ने बनवाए और न नेहरू जी ने, लेकिन शिव मन्दिर, गंगा का मन्दिर तोड़ दिया गया। ये मन्दिर औपनिवेश दौर के प्रतीक नहीं थे। पगला बाबा आरोप लगा रहे हैं कि काम करने वाले ठेकेदार हैं वह भी हिन्दू हैं। मन्दिरों को कैसे तोड़ा जा रहा है। अघोर मान्यता वाला काली माता का मन्दिर भी कार्रवाई की जद में आया है। तारकेश्वर महादेव मन्दिर के पास का काफी हिस्सा तोड़फोड़ की जद में आया है।
दरअसल मणिकर्णिका घाट पर अचानक बुलडोजर से जलासेन घाट से लेकर सिंधिया घाट तक गंगा किनारे स्थाई और अस्थाई निर्माण की सफाई की गई। इस दौरान कई छोटे मन्दिर भी ध्वस्त कर दिए गए। भारी मशीनों से मणिकर्णिका घाट पर कॉरिडोर बनाने के लिए कार्रवाई शुरू हुई तो अचानक चौंक भी गए। मशीनों के भारी शोर ने स्थानीय निवासियों का ध्यान आकर्षित किया है। प्रशासन के अनुसार इस क्षेत्र को विकसित करने के क्रम में यह कार्रवाई की जा रही है। काशी की संकरी गलियों और ऐतिहासिक घाटों की सूरत बदलने की कवायद अब अपने अगले चरण में पहुंच गई है। दुनिया में कोई देश कायाकल्प के नाम पर अपना मौलिक स्वरूप नहीं बदलता, उल्टे उसे संरक्षित करता है, लेकिन काशी में सब कुछ बेसिर-पैर का हो रहा है। काशी को क्वेटो बनाने की सनक इसके पीछे है। आने वाली पीढ़ी अब प्राचीन काशी को ढूंढती रह जाएगी। वो मुमकिन है कि किताबों से भी गायब कर दी जाए।
आपको मणिकर्णिका घाट के बारे मे भी बताए देता हूं। मणिकर्णिका घाट (काशी) को पौराणिक संदर्भ में हिन्दू धर्म में अत्यंत प्राचीन, गूढ़ और मोक्ष-दायक माना जाता है। मणिकर्णिका दो शब्दों से बना है मणि+रत्नकर्णिका= कान का आभूषण। पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती काशी में विचरण कर रहे थे, तब माता पार्वती के कान की मणि (कुंडल) इस स्थान पर गिर गई। शिवजी ने उस मणि को खोजा, किंतु वह नहीं मिली। उसी स्थान पर बाद में मणिकर्णिका कुण्ड और घाट की स्थापना हुई। मान्यता है कि सृष्टि के प्रलय काल में भी काशी नष्ट नहीं होती। मणिकर्णिका वही स्थान है जहां शिव स्वयं मुक्ति का मंत्र (तारक मंत्र- राम) मृतात्मा के कान में फूंकते हैं। इसलिए यहां दाह-संस्कार को सीधा मोक्ष देने वाला माना गया है।
इस घाट का गरुड़ पुराण और काशी खण्ड (स्कंद पुराण) में भी उल्लेख मिलता है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार- भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या के लिए अपने सुदर्शन चक्र से पृथ्वी खोदी। उस कुण्ड में अपने पसीने से जल भरा। वही जलाशय आगे चलकर मणिकर्णिका कुण्ड कहलाया। इस कारण यह स्थान शैव और वैष्णव परंपराओं का संगम माना जाता है। कुछ शाक्त परंपराओं में यह भी मान्यता है कि सती देवी का कर्णाभूषण (कान का गहना) यहां गिरा, इसलिए यह स्थान आंशिक रूप से शक्ति-तत्व से भी जुड़ा माना जाता है।
कहते हैं कि मणिकर्णिका काशी का शाश्वत श्मशान है। मणिकर्णिका घाट को महा श्मशान अर्थात काल पर विजय का स्थल कहा जाता है, यहां चिता की आग कभी बुझती नहीं। मृत्यु को भय नहीं, उत्सव माना जाता है। जीवन और मृत्यु का दर्शन प्रत्यक्ष दिखता है। काशी में प्रसिद्ध कहावत है- ‘काशी में मरे, सो मोक्ख पाए’ और ‘मणिकर्णिका में जले, सो भव-सागर से तर जाए’। इस प्रकार मणिकर्णिका घाट केवल श्मशान नहीं, बल्कि शिव की करुणा, विष्णु की तप-स्थली, शक्ति का संकेत और मोक्ष की अंतिम सीढ़ी है। अब काशी को काशी रहने दिया जाए या नहीं, ये काशी के लोग और हिन्दुत्व के ठेकेदार जानें। हम कुछ कहेंगे तो राष्ट्रद्रोह हो जाएगा।


