– राकेश अचल
अड्डा और अड्डेबाजी तो हमारी देसी सभ्यता की अनऑफिशियल यूनिवर्सिटी है। आप कहेंगे कि अड्डा क्या बला है? तो बता दूं कि अड्डा वो जगह है जहां चाय/ काफी कभी ठण्डी नहीं होती ज्ञान कभी खत्म नहीं होता और काम कभी शुरू नहीं होता। अड्डा कोई इमारत नहीं, एक मानसिक अवस्था है। अड्डेबाजी बैठकर दुनिया सुधारने की सामूहिक प्रक्रिया, जिसमें देश कैसे चलेगा? 5 मिनट में तय। क्रिकेट टीम हर कोई चयनकर्ता, सरकार हर कोई पूर्व प्रधानमंत्री, साहित्य हर कोई निराला का वारिस?
अड्डेबाजी कब शुरू हुई, इसे लेकर इतिहासकार बंटे हुए हैं, पर मोटा-मोटा सच ये है जब से इंसान के पास खाली समय और चाय एक साथ आए तभी से अड्डेबाजी शुरू हुई। कुछ विद्वान कहते हैं- महाभारत के बाद संजय अगर धृतराष्ट्र को लाइव कमेंट्री न देता तो अड्डेबाजी वहीं खत्म हो जाती। अगर आप पूछें कि कहां शुरू हुई? तो मुझे अपने गांव का पीपल, ग्वालियर में महाराज बाड़ा पर गोदाजी का होटल, नई सड़क पर चाय ठेला, कॉलेज का कैंटीन, अखबार वाला नाका बेसाख्ता याद आता है। आज-कल व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक लाइव, यूट्यूब कमेंट बॉक्स बहस के अड्डे हैं। जगह बदली, अड्डा वही रहा।
अड्डेबाजी के कुछ संवैधानिक नियम होते हैं- जो सबसे ज्यादा बोले, वही सबसे बड़ा ज्ञानी। तथ्य की कोई जरूरत नहीं, सुनना ही काफी है। असहमति हो तो वाक्य शुरू करो— देखो, मैं गलत हो सकता हूं लेकिन… अंत में निष्कर्ष- कुछ नहीं बदलने वाला भाई? समाज में अड्डे का अपना रोल है। अड्डा लोकतंत्र का बैक-एंड सर्वर है। गरीब की संसद, बेरोजगार का थिंक-टैंक और पत्रकारों का रॉ मैटीरियल। निष्कर्ष ये कि अड्डा कोई बला नहीं, यह भारतीय आत्मा का अनौपचारिक संस्करण है।
ग्वालियर में शराब के, सट्टे के, जुए के, नशे के अड्डे तो बरकरार हैं, किंतु अहम बुद्धिजीवियों के अड्डे उजड़ गए थे। भला हो पवन करण का जो उन्होंने इंडियन काफी हाउस में नया अड्डा शुरु कर दिया। शनिवार को हम भी इस अड्डे पर जा धमके। शिल्पकार चंद्रसेन जाधव, नाटककार अयाज खान, पत्रकार नसीर कुरैशी और कवि पवन करण के साथ कोई डेढ़ घण्टे गपशप की। कॉफी मात्र बहाना थी। चंदू भाई लघुशंका के लिए उठे और कब कॉफी का भुगतान कर आए पता ही नहीं चला। बहरहाल गोदाजी के होटल के मुकुट बिहारी सरोज, प्रो. प्रकाश दीक्षित, राजेन्द्र सिंह, कक्का डोंगर सिंह, रामचंद्र सर्वटे, कामरेड मोतीलाल शर्मा के अड्डे से हम सब एक बार फिर इंडियन काफी हाउस के अड्डे तक आ गए हैं।
अड्डेबाजी करना हो तो आप भी आइये। शनिवार हो या और कोई और दिन, शाम 4 बजे कोई न कोई आपको मिल जाएगा और हां, जो अड्डेबाजी को कोसता है, वो भी कहीं न कहीं अड्डे पर बैठकर ही कोसता है? हमने भी आज गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के घामड कुलपति को उनकी अशिष्टता के लिए कोसा। वहां मौजूद मूकदर्शकों को भी कोसा, कोसना बनता था।


