– राकेश अचल
भारत सरकार देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की सनक में अब देश की शैक्षणिक संस्थाओं के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, सरकार की सनक का पहला शिकार बनी है जम्मू के रियासी स्थित श्रीमाता वैष्णोदेवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस। हिन्दू वादी संगठनों के विरोध के बाद भारत के राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने गंभीर खामियों का हवाला देते हुए इस संस्थान को दी गई मेडिकल कोर्स एमबीबीएस संचालित करने की अनुमति रद्द कर दी। एनएमसी भारत में मेडिकल शिक्षा और डॉक्टरों के पेशेवर आचरण की निगरानी करता है। लेकिन अब लगता है कि एनएमसी किसी भगवा संगठन की निगरानी में चलने वाली संस्था है। भारत में मेडिकल कोर्स संचालित करने के लिए एनएमसी की अनुमति अनिवार्य है।
इस मेडिकल कॉलेज को पिछले साल सितंबर में इसी सत्र (2025-26) से 50 सीटों पर छात्रों के दाखिले की अनुमति दी गई थी, ये पहला बैच था। कॉलेज की इन 50 सीटों में से 40 से अधिक सीटों पर मुसलमान छात्रों को दाखिला मिला था। इसके बाद से ही श्रीमाता वैष्णोदेवी संघर्ष समिति के बैनर तले कई हिन्दूवादी संगठन मेडिकल कॉलेज में मुसलमान छात्रों के अधिक संख्या में दाखिले का विरोध शुरू कर दिया। इसी विरोध के आगे एनएमसी झुकी। एनएमसी के आदेश के बाद एक तरफ हिन्दूवादी संगठनों ने जश्न मनाया, लेकिन दूसरी तरफ इस कॉलेज में शिक्षा ले रहे छात्रों के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि अगर एसएमवीडीआईएमई में खामियां थीं तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि उनकी सरकार प्रभावित छात्रों को अन्य मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का प्रबंध करेगी। उन्होंने कहा कि छात्रों को उन कॉलेजों में दाखिला दिलाया जाएगा जो उनके घरों के नजदीक हैं। एनएमसी ने भी अपने आदेश में कहा था कि शिक्षा हासिल कर रहे छात्रों का दाखिला दूसरे कॉलेजों में करवाने की व्यवस्था की जाएगी। एनएमसी ने हिन्दू संगठनों को खुश करने के लिए गत दो जनवरी को कॉलेज का आकस्मिक निरीक्षण किया था और छह जनवरी को कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स के संचालन की अनुमति वापस लेने का आदेश जारी कर दिया। एनमीसी ने अपनी जांच के दौरान मेडिकल कॉलेज में कई खामियां सामने आने का हवाला दिया है। एनएमसी ने इंस्टीट्यूट के इंफ्रास्ट्रक्चर में गंभीर खामियां बताई हैं। इनमें फैकल्टी की संख्या, क्लिनिकल मटीरियल और अन्य चीजों का हवाला दिया गया है।
हकीकत ये है कि नवंबर में कॉलेज में दाखिला लेने वाले छात्रों की सूची सार्वजनिक होने के बाद से ही इसका विरोध शुरू हो गया था। एसएमवीडीआईएमई में निर्धारित 50 सीटों में से 40 से अधिक सीटों पर मुसलमान छात्रों को नीट परीक्षा में मेरिट के आधार पर दाखिला मिलने के बाद 22 नवंबर को श्रीवैष्णो देवी संघर्ष समिति का गठन हुआ था। गठन के बाद से ही श्रीमाता वैष्णो देवी संघर्ष समिति इस मेडिकल कॉलेज के खिलाफ अभियान चला रही थी और एमबीबीएस कोर्स की मान्यता रद्द करने की मांग कर रही थी। इस संघर्ष समिति में 50 से अधिक संगठन शामिल थे, जिनमें आरएसएस और बीजेपी से जुड़े संगठन भी थे। बजरंग दल ने कॉलेज के खिलाफ उग्र प्रदर्शन भी किया था।
एनएमसी का निर्णय आने से एक दिन पहले भी समिति ने जम्मू सिविल सचिवालय के बाहर धरना दिया था। जम्मू में चक्का जाम की चेतावनी भी दी थी। इसके एक दिन बाद ही एनएमसी ने कॉलेज में कोर्स की अनुमति वापस लेने का आदेश जारी कर दिया था। एनएमसी की कार्रवाई के बाद मेडिकल कॉलेज के खिलाफ अभियान चला रही समिति ने इसे अपने प्रयासों का नतीजा बताते हुए जश्न मनाया। मिठाई बांटी और ढोल-नगाड़ों पर नाच किया। इस आदेश के बाद समिति के संयोजक रिटायर्ड कर्नल सुखवीर सिंह मंकोटिया ने कहा कि 45 दिनों के आंदोलन की जीत हुई है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा का धन्यवाद। उन्होंने इस निर्णय को तुरंत करवाया। यह न्याय की विजय है। समिति से जुड़े और सनातन धर्मसभा के संयोजक पुरुषोत्तम दाधिची ने कहा कि हम उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का भी धन्यवाद करते हैं। हमें जानकारी मिली है कि एलजी मनोज सिन्हा का भी इस निर्णय में सहयोग मिला है।
संघर्ष समिति के कॉलेज बंद होने पर जश्न मनाने पर मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तिलमिलाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि ये जश्न किस बात का है। अगर बच्चों का भविष्य खराब करके आपको खुशी मिल रही है तो फोड़िए पटाखे। अब्दुल्ला ने कहा कि इस बार 50 में से 40 कश्मीर में आए, एक दो साल बाद ये 50 सीटें 400 सीटें बन जाती, मुमकिन है उनमें दो-ढाई सौ बच्चे जम्मू के होते, अब मेडिकल कॉलेज की सीट उन्हें मिलेगी नहीं, क्योंकि मजहब के नाम पर आपने पूरा कॉलेज बंद करा दिया है।
जम्मू-कश्मीर के बीजेपी नेताओं ने भी इस निर्णय का समर्थन किया है.। जम्मू-कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष सत शर्मा ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा का धन्यवाद देते हुए कहा कि एनएमसी का निर्णय स्वागत योग्य है। एनएमसी मेडिकल कॉलेजों की गुणवत्ता की निगरानी करती है और किसी भी कॉलेज को मेडिकल कोर्स शुरू करने से पहले निरीक्षण की जटिल और लंबी प्रक्रिया से गुज़रना होता है और तय मानकों पर खरा उतरना होता है। कोर्स शुरू करने की अनुमति देने से पहले भी मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण किया जाता है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने फैकल्टी, इंफ्रास्ट्रक्चर और क्लिनिकल एक्सपोजर की कमी के चलते एमबीबीएस कोर्स की अनुमति रद्द करती है। इसलिए जम्मू का मामला कोई अपवाद नहीं होता, किंतु इसका राजनीतिक और सांप्रदायिक संदर्भ इसे असाधारण बनाता है। कांग्रेस के प्रवक्ता रविन्द्र शर्मा ने सवाल उठाते हुए कहा कि माता वैष्णो देवी के नाम पर खुले मेडिकल कॉलेज के बंद होने से जम्मू को क्या हासिल हुआ?
श्रीमाता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी जम्मू क्षेत्र के दक्षिणी रजौरी जिले के कटरा में स्थित है। यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में इसी साल एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू हुई थी। इस यूनिवर्सिटी की स्थापना साल 1999 में जम्मू-कश्मीर राज्य विधान मण्डल के एक अधिनियम के तहत एक आवासीय और तकनीकी यूनिवर्सिटी के रूप में की गई थी, जिसको विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने मंज़ूरी दी थी। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं और माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के चेयरमैन भी। खास बात ये है कि इस यूनिवर्सिटी को श्रीमाता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड से फंडिंग मिलती है। हिन्दू संगठन मुसलमान छात्रों को इसका लाभ न मिले इसलिए आंदोलन चला रहे थे। यूनिवर्सिटी को जम्मू-कश्मीर सरकार से भी फंड मिलता है।


