– राकेश अचल
सुप्रीम कोर्ट को क्या हो गया है? सुप्रीम कोर्ट पहाड़ से भी ज्यादा सुप्रीम हो गया है और ये तय करने लगा है कि पहाड़ की कद-काठी क्या होगी? सुप्रीम कोर्ट के अरावली पहाड़ियों की परिभाषा बदलने के बाद लगभग पूरे उत्तर भारत में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।
आप जानते हैं कि अरावली पर्वत श्रंखला भारत की 7 पर्वत श्रंखलाओं में से एक है, जो दुनिया की सबसे पुरानी भूगर्भीय संरचनाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और राजधानी दिल्ली तक फैली हुई है। केन्द्र सरकार की सिफारिशों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की जिस परिभाषा को स्वीकार किया है, उसके अनुसार आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंचे जमीन के हिस्से को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो या उससे ज्यादा ऐसी पहाड़ियां जो 500 मीटर के दायरे के अंदर हों और उनके बीच जमीन भी मौजूद हो, तब उन्हें अरावली श्रृंखला का हिस्सा माना जाएगा।
मैं कानून का मामूली छात्र रहा हूं, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारे किसी कानून में किसी भी पहाड़ की कद काठी नापने का कोई फार्मूला नहीं दिया गया है। पहाड़ प्रकृति की संरचना है। दुनिया की कोई अदालत किसी नदी, किसी पहाड़, किसी समंदर का आकार तय नहीं कर सकती, लेकिन हमारे यहां अदालत नाम की ही नहीं काम की भी सुप्रीम है। कुछ भी कर सकती है। अदालत को समझना चाहिए कि अरावली अपनी पैरवी करने अदालत नहीं आ सकता। आ सकता तो कहता कि मी लार्ड! मेरा कद आपका दिया हुआ नहीं है। इसलिए मुझे संरक्षण दो उत्खनन करने वालों को नहीं।
हिन्दुस्तान अकेला देश है जहां मनुष्य पहाड़ों, नदियों और जंगलों का दुश्मन है। राजसत्ता के संरक्षण में भारत में प्रकृति के हर उपहार का बेरहमी से दोहन किया जा रहा है। सरकार इन पहाड़ों, जंगलों और नदियों की निगेबान बनने के बजाय उनकी बर्बादी के अभियान में शामिल है और दुर्भाग्य ये है कि अब देश की सबसे बड़ी अदालत भी इसमें शामिल हो गई है। मैंने दुनिया के तमाम देशों में नदियों, पहाड़ों और जंगलों की परवरिश करते हुए समाज, सरकार और कानून को देखा है। किंतु भारत अकेला ऐसा देश है जहां नदियों, जंगलों और पहाड़ों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। सरकारें जंगलों को एक रुपए की लीज पर जंगल दे रही है। गंगा जैसी नदियां जहरीली हो गई हैं, हिमालय को खोखला कर दिया गया है और सुप्रीम कोर्ट मूकदर्शक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी-छोटी झाड़ियों से ढंकी पहाड़ियां भी रेगिस्तान बनने से रोकने, भूजल रीचार्ज करने और स्थानीय लोगों के रोजगार में अहम योगदान देती हैं, अरावली को सिर्फ ऊंचाई से नहीं बल्कि उसके पर्यावरणीय, भूगर्भीय और जलवायु संबंधी महत्व से परिभाषित किया जाना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ों और पहाड़ी प्रणालियों की पहचान उस काम से होती, जो उनके होने से संभव होते हैं न कि ऊंचाई के किसी मनमाने पैमाने से। मेरी पक्की धारणा है कि जमीन का कोई भी हिस्सा जो भूगर्भीय रूप से अरावली का हिस्सा है और पर्यावरण संरक्षण या रेगिस्तान बनने से रोकने में अहम भूमिका निभाता है, उसे अरावली माना जाना चाहिए, चाहे उसकी ऊंचाई कितनी भी हो। हकीकत ये है कि अरावली पर बेनकाब हुई है सरकार। हकीकत ये भी है कि अदानी को बिहार में पावर प्लांट के लिए ‘एक रुपए में एक हजार एकड़Ó जमीन दे दी गई है, गुजरात में पाकिस्तान सीमा के पास अदानी के किस प्रोजेक्ट पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं।
स्थानीय कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि सरकार अरावली क्षेत्रों को वैज्ञानिक मानकों से परिभाषित करे, जिसमें उसका भूगोल, पर्यावरण, वन्यजीव संपर्क और जलवायु संघर्ष क्षमता शामिल हो। वैसे अदालत की नई परिभाषा से खनन, निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे पारिस्थितिकीय तंत्र को नु$कसान होने का ख़तरा बढ़ जाएगा। संतोष की बात है कि विपक्षी दलों ने भी इस मामले में अपनी आवाज तेज कर दी है। उनका कहना है कि नई परिभाषा से पर्यावरण और पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि अरावली की रक्षा को दिल्ली का अस्तित्व बचाने से अलग नहीं किया जा सकता। राजस्थान कांग्रेस के नेता टीका राम जुल्ली ने अरावली को राज्य की जीवन रेखा बताया और कहा कि अगर अरावली न होती तो दिल्ली तक का पूरा इलाका रेगिस्तान बन गया होता। केन्द्र सरकार इन चिंताओं को कम गंभीर दिखाने की कोशिश कर रही है। एक बयान में कहा गया कि नई परिभाषा का मकसद नियमों को मजबूत करना और एकरूपता लाना है। बयान में यह भी कहा गया है कि खनन को सभी राज्यों में समान रूप से नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ परिभाषा जरूरी थी। इसमें जोड़ा गया है कि नई परिभाषा पूरे पहाड़ी तंत्र को शामिल करती है, जिसमें ढलानें, आस-पास की जमीन और बीच के इलाके शामिल हैं, ताकि पहाड़ी समूहों और उनके आपसी संबंधों की सुरक्षा हो सके। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अभेद्य क्षेत्रों, जैसे कि संरक्षित जंगल, पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र और आर्द्रभूमि में खनन पर पूरी तरह रोक है।
हालांकि इसका अपवाद कुछ विशेष, रणनीतिक और परमाणु खनिज हो सकते हैं, जिसकी अनुमति कानूनन दी गई हो। पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने कहा कि एक लाख 47 हजार वर्ग किमी में फैली अरावली श्रृंखला का लगभग 2 फीसदी हिस्सा ही संभावित रूप से खनन के लिए इस्तेमाल हो सकता है और वह भी विस्तृत अध्ययन और आधिकारिक मंज़ूरी के बाद। हालांकि विरोध कर रहे कई समूहों ने कहा है कि प्रदर्शन जारी रहेंगे और वे अदालत की नई परिभाषा को चुनौती देने के लिए कानूनी विकल्प तलाश रहे हैं।


