– राकेश अचल
रामचरित मानस की चौपाई ‘हुइहै वही जो राम रचि राखा’ मुझे हर समय संबल प्रदान करती है। आज भी मैं औरों की तरह चोंका नहीं जब अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के बाहर सीआरपीएफ की बख्तरबंद गाड़ियों का रेला नजर आया। टेढ़ी बाजार ओवर ब्रिज पर लाइन से खड़ी इन 17-18 गाड़ियों में दरअसल, सीआरपीएफ के वे जवान थे जो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और असम विधानसभा चुनाव में लगी ड्यूटी पर रवाना होने से पहले रामलला के दर्शन करने आए थे।
सीआरपीएफ जवानों का ये काफिला अयोध्या होते हुए जा रहा था। रविवार को काफिला जैसे ही अयोध्या पहुंचा, सभी बख्तरबंद गाड़ियों को टेढ़ी बाजार ओवर ब्रिज पर साइड लगाकर रोक लिया गया। इसके बाद सीआरपीएफ के जवान गाड़ियों से उतरे और मन्दिर जाकर पूजा-अर्चना कर ड्यूटी से पहले श्रीराम जन्म भूमि मन्दिर पहुंचकर भगवान राम का आशीर्वाद लिया।
देश में लोकसभा के चुनाव हों या विधानसभा के, चुनावों के दौरान किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकने, सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित कराने के लिए सीआरपीएफ की तैनाती की जाती है। सीआरपीएफ के जवान वोटिंग की तारीख से एक-दो दिन पहले ही मतदान केन्द्र पर पहुंचकर उसे अपने कंट्रोल में ले लेते हैं। इसके बाद पोलिंग अधिकारियों और पुलिस के साथ मिलकर सीआरपीएफ शांतिपूर्ण मतदान कराना सुनिश्चित करती है।
सीआरपीएफ की निष्ठा पहले क्राउन के प्रति थी, बाद में भारत के संविधान के प्रति हुई और अब रामलला के प्रति है। सीआरपीएफ का पूरा नाम केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल है। यह भारत का सबसे बड़ा केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल है, जो भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
सीआरपीएफ की स्थापना 27 जुलाई 1939 को क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस के रूप में ब्रिटिश काल में हुई थी। स्वतंत्रता के बाद 28 दिसंबर 1949 को सीआरपीएफ अधिनियम लागू होने पर इसका नाम केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल हो गया। अब तक इस बल ने 86 वर्ष पूरे कर लिए हैं और यह आंतरिक सुरक्षा का प्रमुख बल बन चुका है। अभी तक ये धर्मनिरपेक्ष संगठन था, लेकिन अब लगता है कि रामभक्त सरकार के मौखिक निर्देश पर सीआरपीएफ भी धार्मिक या अर्ध धार्मिक संगठन हो गया है। यदि ऐसा न होता तो कोई भी उसे मन्दिरोन्मुख नहीं कर सकता था।
सीआरपीएफ मुख्य रूप से आंतरिक सुरक्षा से बाबस्ता है। राज्य सरकारों और संघ शासित प्रदेशों की सहायता में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, भीड़ नियंत्रण, दंगा नियंत्रण और सार्वजनिक व्यवस्था, आतंकवाद विरोधी अभियान और नक्सलवाद से मुकाबला करने के साथ-साथ वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी और संवेदनशील क्षेत्रों में भी सीआरपीएफ की तैनाती होती है।
सीआरपीएफ पहली बार चुनाव ड्यूटी करने नहीं जा रहा लेकिन मन्दिर पहली बार गया है। फोर्स में सभी जाति धर्मों के लोग हैं, मुमकिन है कि वे भी भविष्य में चुनाव या किसी भी ड्यूटी पर जाने से पहले अपने-अपने आराध्य का आशीर्वाद लेने का आग्रह करें। ऐसे में क्या सबको धार्मिक स्वतंत्रता सीआरपीएफ दे पाएगी?
मुझे पूरा यकीन है कि सीआरपीएफ जवानों का रामलला के दर्शन करने का फैसला तात्कालिक और सामूहिक नहीं होगा। इसके लिए केन्द्र सरकार ने भी कोई निर्देश नहीं दिए होंगे। मन्दिर जाने के लिए किसी आला अफसर से इजाजत भी नहीं ली गई होगी। ये फैसला फोर्स के उन अफसरों का होगा जिनका मन राम में रमा होगा। उन्होंने कुछ गलत भी नहीं किया लेकिन उनके इस कदम से जो संदेश देश में जा रहा है, वो चिंताजनक और गंभीर है।
सीआरपीएफ के अचानक रामभक्त हो जाने से उन पांच राज्यों के विधर्मी भारतीय आशंकित हो सकते हैं जहां विधानसभा चुनाव होने हैं। गैर हिंदू मतदाता को लग सकता है कि सीआरपीएफ केवल उनकी सुरक्षा के लिए है जो जय श्रीराम बोलते हैं। मेरे हिसाब से सीआरपीएफ हो या कोई दूसरा वर्दीधारी संगठन उसे सार्वजनिक और सामूहिक रूप से अपनी धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। ये आजादी केवल खादीधारी नेताओं को है। बहरहाल हमें उम्मीद रखना चाहिए कि सरकार सीआरपीएफ समेत किसी भी सेन्य, अर्ध सैन्य संगठन का भगवाकरण नहीं होने देगी।


