चेन्नई, 06 अप्रैल। तमिलनाडु में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इन सूचियों के विश्लेषण से एक चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया है- राज्य की मुख्यधारा की राजनीति से ब्राह्मण उम्मीदवारों का लगभग पूरी तरह गायब होना। करीब 3 प्रतिशत आबादी वाले इस समुदाय को द्रविड़ राजनीति के गढ़ में इस बार बड़ी पार्टियों ने टिकट देने से परहेज किया है। राजनीतिक विश्लेषक इसे राज्य के चुनावी इतिहास में एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाला फैसला अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) का रहा है। लगभग 35 वर्षों में यह पहली बार है जब पार्टी ने एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है। पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद से पिछले 10 वर्षों में पार्टी ने केवल एक बार 2021 में इस समुदाय के व्यक्ति को टिकट दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि जयललिता और एमजीआर के दौर में ब्राह्मण उम्मीदवार पार्टी की प्राथमिकता हुआ करते थे, लेकिन अब समीकरण बदल चुके हैं। राजनीतिक टिप्पणीकारों के अनुसार, जयललिता के बाद ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा है, जिसके कारण अन्नाद्रमुक को अब इस समुदाय को टिकट देने में कोई सीधा चुनावी लाभ नजर नहीं आ रहा है। हैरानी की बात यह है कि हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी 27 सीटों की सूची में किसी ब्राह्मण चेहरे को स्थान नहीं दिया है। इसी तरह सत्ताधारी द्रमुक (डीएमके) और कांग्रेस ने भी इस समुदाय से दूरी बनाई है। द्रमुक की राजनीति का आधार ही गैर-ब्राह्मण सशक्तिकरण रहा है, इसलिए उनकी सूची में यह बदलाव स्वाभाविक माना जा रहा है।
हालांकि मुख्यधारा की पार्टियों के उलट कुछ नए और छोटे दलों ने अलग राह चुनी है। अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (टीवीके) ने दो ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि विजय इसके जरिए संदेश देना चाहते हैं कि उनकी पार्टी ब्राह्मण-विरोधी नहीं है। वहीं, तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी नाम तमिलर कच्ची (एनटीके) ने सबसे अधिक छह ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। सीमन ने मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे क्षेत्रों को चुना है जहां ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। जानकारों का कहना है कि सीमन द्रविड़ दीवार को तोड़ने के लिए हर सामाजिक समीकरण का इस्तेमाल कर रहे हैं। कुल मिलाकर, तमिलनाडु की चुनावी बिसात पर इस बार पारंपरिक जातीय प्रतिनिधित्व के मायने बदलते दिख रहे हैं।
Sunday, September 27
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