– राकेश अचल
दुनिया के पास एक ऐसी घड़ी है जो प्रलय की घड़ी कही जाती है। शिकागो की नॉन-प्रॉफिट संस्था बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स ने 1947 में कोल्ड वॉर के दौरान यह क्लॉक बनाई थी, ताकि लोगों को दुनिया के खतरे के बारे में जागरूक किया जा सके। इसे डूम्ड डे क्लाक कहते हैं।
प्रलय यानि कयामत की अवधारणा एक गहन दार्शनिक और धार्मिक विचार है, जो विभिन्न धर्मों में दुनिया के अंत, विनाश और उसके बाद के पुनर्जन्म या न्याय से जुड़ा हुआ है। हिन्दू शास्त्रों (पुराण, वेदांत, महाभारत आदि) में प्रलय का अर्थ है- संसार का अपने मूल कारण प्रकृति में सर्वथा लीन (लय) हो जाना। यह सृष्टि का सर्वनाश है, जहां पूरा ब्रह्माण्ड जलमग्न, अग्निमग्न या भस्म होकर ब्रह्म में समा जाता है। इस्लाम में कयामत का अर्थ भी प्रलय या दुनिया का अंत है। कुरान और हदीस में इसका विस्तार से वर्णन है। यह एक बार होने वाली घटना है। कयामत यानि हिसाब-किताब का दिन, इंसान ने प्रलय की घड़ी बनाकर मानवता पर कोई उपकार किया है या नहीं ये तो प्रलय के आने पर ही पता चलेगा, लेकिन इस घड़ी की जरूरत दुनिया के बजाय हिंदुस्तान को ज्यादा है, क्योंकि भारत में जीवन की लय हमेशा टूटती रहती है। अब देखिए न महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार के जीवन में प्रलय आई और किसी को भनक तक नहीं लगी।
प्रलय की घड़ी होती तो मुमकिन है कि अजित पवार हमारे बीच मौजूद होते। वे होते तो हमें चौथ वसूली करने वाले भाजपा नेताओं के नाम बताते, सबूत देते। कभी-कभी लगता है कि चौथ वसूली के सबूत ही तो कहीं पवार साहब की जान के दुश्मन तो नही बन गए? इंसान की जान का दुश्मन कोई भी बन सकता है। आपकी हैंकड़ी, सच बयानी, मान, प्रतिष्ठा प्रश्नाकुलता आदि, इत्यादि। दुर्भाग्य ये है कि जीवन में होने वाली प्रलय के बारे में कोई भी जांच सच का पता नहीं कर पाती। ममता बनर्जी ने पवार साहब के जीवन में हुई प्रलय के बारे में कुछ कहा तो पूरी भाजपा बिदक गई। भाजपा की सहनशीलता लगातार कम हो रही है।
हमारे वेद, पुराणों, कथाओं में विमान, शल्यक्रिया, कृत्रिम गर्भाधान का उल्लेख तो है लेकिन प्रलय की घड़ी का कोई जिक्र नहीं है। नेहरू जी ने भी स्वदेशी अभियान के तहत प्रलय की घड़ी के विकास और अनुसंधान पर ध्यान नहीं दिया और मोदी जी ने भी। प्रलय की घड़ी यानि डूम्सडे क्लाक के बारे मेंकल तक हमें भी पता न था। हमें ये भी पता न था कि इस घड़ी को आगे-पीछे किया जा सकता है। खबर है कि डूम्सडे क्लॉक अब मिडनाइट से सिर्फ 85 सेकेंड पहले सेट की गई है- इतिहास में सबसे करीब। वैज्ञानिकों ने रूस, चीन, अमेरिका की आक्रामकता, यूक्रेन-मिडिल ईस्ट युद्ध, न्यूक्लियर संधियों का टूटना, कृत्रिम बुद्धि के खतरे, डिसइंफॉर्मेशन और जलवायु परिवर्तन को मुख्य वजह बताया है। वैश्विक लीडरशिप की कमी से खतरा बढ़ रहा है। न्यूक्लियर युद्ध का जोखिम ज्यादा है।
एटॉमिक साइंटिस्ट्स की टीम ने अपनी प्रसिद्ध डूम्सडे क्लॉक को मिडनाइट (आधी रात) के 85 सेकेंड पहले सेट कर दिया है। यह अब तक का सबसे करीबी समय है, जो बताता है कि दुनिया विनाश के कितने करीब पहुंच गई है। पिछले साल यह 89 सेकंड पहले था यानी अब 4 सेकंड और करीब आ गया। यह क्लॉक सिर्फ चेतावनी है, लेकिन बताती है कि अगर सहयोग नहीं बढ़ा तो विनाश हो सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि रूस, चीन और अमेरिका जैसे देश ज्यादा राष्ट्रवादी हो रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय एकता को तोड़ रहा है। एआई और न्यूक्लियर हथियारों पर कंट्रोल जरूरी है। हमारे पास भी काश ऐसी घड़ी होती तो हमें बत सकती थी कि हमारे राजनीतिक दलों में सहयोग बढ़ रहा है या नहीं?

