– राकेश अचल
सीमा से लगे बांग्लादेश से अच्छी खबरें नहीं आ रही हैं। अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश एक बार फिर से भी हिंसा और नफरत की आग में झुलस रहा है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे भारत में मुसलमान और ईसाई बनाए जाते हैं। हाल में दीपूचंद्र दास और अमृत मंडल की भयावह हत्या कर दी गई। इस बीच त्रस्त बांग्लादेश में फंसे और सताए जा रहे हिन्दू नागरिक आतंक से बचने के लिए भारत से सीमाएं खोलने की गुहार लगा रहे हैं।
दुर्भाग्य की बात ये है कि दुनिया में हिन्दुत्व के सबसे बड़े ठेकेदार आरएसएस और भाजपा को बांग्लादेश के हिन्दुओं का आर्तनाद सुनाई नहीं दे रहा। पड़ौसी देशों में रहने वाले हिन्दुओं को शरण देने के लिए भारतीय नागरिकता कानून में संशोधन करने वाली मोदी सरकार के गृहमंत्री अमित शाह भी बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ हो रही ज्यादतियों के मुद्दे पर गुड़ खाकर बैठे हैं। आरएसएस के डॉ. मोहन भागवत का अता पता नहीं है। पिछले दिनों निर्वासित बांग्लादेश सनातन जागरण मंच के नेता निहार हलदर की मदद से रंगपुर, चटगांव, ढाका और मयमन सिंह में रहने वाले हिन्दू नागरिकों से मीडिया ने बातचीत की। स्थानीय हिन्दुओं का कहना है कि वे अपने धर्म के कारण लगातार अपमान सह रहे हैं। हड़क के चलते समय हिन्दुओं पर जो ताने सुनने को मिलते हैं, वे जल्द ही भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं में तब्दील हो सकते हैं। अल्पसंख्यक हिन्दुओं का कहना है कि हम फंस गए हैं और हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है। हम इसलिए अपमान सह रहे हैं, क्योंकि हमें डर है कि जो दीपू या अमृत का हुआ वैसा हाल हमारा ना हो जाए।
बांग्लादेश के हिन्दूओं को पूर्व राष्ट्रपति खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान की बांग्लादेश वापसी ने उन्हें और भी चिंतित कर दिया है। उन्हें डर है कि अगर बीएनपी सत्ता में आती है, तो हिन्दू अल्पसंख्यकों को और भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। बांग्लादेश में शेख हसीना की अवामी लीग ही हिन्दुओं की एकमात्र रक्षक थी। लेकिन उस पर पाबंदी है और खुद शेख हसीना भारत में शरण लिए हैं। आपको बता दें कि बांग्लादेश में कोई 25 लाख हिन्दू आबादी है। भारत में तमाम हिन्दू संगठन बांग्लादेश के हिन्दुओं के मुद्दे पर दिखावे की बातें कर रहे हैं, लेकिन कर कुछ नहीं रहे। हम एक नरसंहार की ओर बढ़ रहे हैं। भारत की सरकार ने भी कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है। बांग्लादेशी हिन्दुओं का कहना है कि यदि भारत की कि सीमाएं खुल जाएं तो कम से कम हिन्दू हिंसा से सुरक्षित तो रहेंगे।
आपको याद होगा कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को मुद्दा बनाए बैठी सरकार के लिए बांग्लादेशी हिन्दुओं के लिए सीमा खोलना आसान नहीं है। संघ और भाजपा बांग्लादेशी हिन्दुओं की दुर्दशा पर कितने ही घड़ियाली आंसू बहा लें, किंतु जमीनी स्तर पर कोई कुछ करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि दुनिया की नजरों में भारत में खुद अल्पसंख्यक मुसलमानों और ईसाईयों का उत्पीड़न हो रहा है और सरकार मूक दर्शक बनी हुई है। अभी क्रिसमस पर जिस तरह से देश के तमाम हिस्सों में चर्चों में हिन्दूवादी संगठनों ने जो उत्पात मचाया वो किसी से छिपा नहीं है।
बांग्लादेश की मौजूदा तस्वीर बड़ी भयावह है। ऐसे में भारत के तथाकथित हिन्दूवादी संगठन प्रहसन चाहे जितना कर लें, किंतु तब तक कुछ होगा नहीं होगा जब तक कि भारत की सरकार खुद सामने नहीं आती। बांग्लादेश की घटनाएं भारत में बंगाल विधानसभा चुनाव को भी परोक्ष रूप से प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन इस समय के सरदार पटेल यानि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह बांग्लादेश को आंखें भी तो नहीं दिखा सकते। सरकार बांग्लादेशी हिन्दुओं को बचाने के लिए कोई ऑपरेशन भी तो शुरू नहीं कर सकते। बांग्लादेश के हिन्दुओं के प्रति हमारी सहानुभूति और संवेदना अवश्य हैं। बांकी उनकी रक्षा ऊपर वाला ही कर सकता है, भारत की मोदी सरकार नहीं।

