– राकेश अचल
ये नृत्य मुद्राएं साहित्य भी हैं और साधना भी, कला भी हैं और परंपरा भी, इतिहास भी हैं भूगोल भी, गणित भी हैं और रसायन शास्त्र भी। प्रख्यात ओडशी नृत्य गुरु केलूचरण महापात्र ने शास्त्रीयता को अक्षुण रखा। ज्यादा प्रयोग नहीं किए, लेकिन उनके सुयोग्य सुपुत्र रविकांत महापात्र ने न सिर्फ ओडिशी नृत्य के साथ कथानक में बल्कि संगीत और अभिनय पक्ष में भी दुस्साहसिक प्रयोग किए वह भी आलोचना की परवाह किए बिना।
महापात्र के शिष्यों ने रामचरित मानस और महाभारत के अनेक प्रसंगों में जो प्रयोग किए उनको रेखांकित कलना बेहद जरूरी है, क्योंकि वे ओडिशी नृयत्य के फ्रेम में एकदम नये हैं। कभी कभी लगता है कि दर्शक नृत्य नहीं कोई नृत्य नाटिका देख रहे हैं।
मैंने मप्र सरकार द्वारा लाखों रुपए के बजट से होने वाले खजुराहो नृत्य महोत्सव को कई बार देखा है। वहां और आईटीएम के नृत्य महोत्सव में बुनियादी अंतर है। खजुराहो में पुरातन मन्दिर पार्श्व में होते हैं, लेकिन दर्शक नहीं होते। ग्वालियर के आईटीएम में नाद मंच होता है, लेकिन दर्शकों की अपार भीड़ उस पीढ़ी की होती है जो वाट्सएप विश्वविद्यालय की गिरफ्त में है। ये पीढ़ी जब भरतनाट्यम और ओडिशी नृत्य के जरिए विविध पौराणिक आख्यानों से जुड़ते हैं तो अभिभूत दिखाई देते हैं। तीन दिन के आईटीएम नृत्य महोत्सव से मप्र की कलाप्रेमी सरकार भी सीख सकती है कि कैसे कला, संस्कृति और साहित्य का पारेषण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में किया जा सकता है। यदि आप 10 अप्रैल को ग्वालियर में हैं तो इस नृत्य महोत्सव की अंतिम संध्या के साक्षी बन सकते हैं।
मुझे अफसोस है कि ग्वालियर का मुख्य धारा का मीडिया इतना शुष्क है कि उसे इस महत्वपूर्ण आयोजन की खबर नहीं है। किसी अखबार में, चैनल में जिक्र तक नहीं है। सब नेता परिक्रमा में उलझे हैं। हमारे जमाने में आयोजक आमंत्रित करें या न करें, हम ऐसे आयोजनों का सार अपने पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाते थे। आभार आईटीएम विश्वविद्यालय का, रमाशंकर सिंह का और उन कला गुरुओं का जो हमें समृद्ध करके जाते हैं।


