– राकेश अचल
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को तीन मंजिल की इमारत में लगी आग में झुलसकर 15 लोगों की मौत हो गई। अब राज्य सरकार कार्रवाई के नाम पर लकीर पीट रही है और मुख्यमंत्री घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। भारत में इस तरह के हादसे आए दिन होते हैं, लेकिन इन्हें रोकने की कोई राष्ट्रीय नीति आज तक नहीं बनी।
उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना स्थल पर पहुंचकर हालात का जायजा लिया और मामले की जांच के सख्त निर्देश दिए। मुख्यमंत्री अपना अलीगढ़ का दौरा बीच में ही छोड़कर लखनऊ लौटे और घटना स्थल पर पहुंचकर हालात का जायजा लिया। अधिकारियों के मुताबिक आदित्यनाथ ने पुलिस महानिदेशक और अपर मुख्य सचिव (गृह) मौके पर जाकर घटना का जायजा लेने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले की तह में जाकर दोषियों को सजा दिलाई जाएगी। घटना से गुस्साए सीएम योगी ने अफसरों को कड़ी फटकार लगाई है।
हादसे का शिकार दिल्ली की लवप्रीत ने बताया कि हादसे के वक्त अंदर कोई मदद के लिए नहीं था। हमने हर जगह फोन मिलाया, हम मदद के लिए लगातार चिल्लाते रहे, लेकिन समय पर प्रशासन का कोई व्यक्ति हमारी सुध लेने नहीं आया। ये अग्निकांड हेक्सार स्टूडियो में हुआ। इस संस्थान में लगभग 30 लोग कार्यरत थे। इनमें मुख्य रूप से &डी गेम डेवलपर और &डी आर्टिस्ट जैसे युवा पेशेवर शामिल थे। स्टूडियो में विभिन्न प्रकार के &डी गेम और डिजिटल एनीमेशन प्रोजेक्ट्स तैयार किए जाते थे, जिन्हें आगे बड़े क्लाइंट्स और प्लेटफार्म्स को भेजा जाता था। इसके साथ ही,यहां युवाओं के लिए 3डी एनीमेशन से संबंधित कोर्स भी संचालित किए जाते थे।
प्रारंभिक जांच में भवन की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बेहद गंभीर लापरवाही सामने आई है। दरअसल, दफ्तर का मेन गेट थंब इम्प्रेशन यानी बायोमेट्रिक सिस्टम से खुलता था। आग लगते ही बिजली कटने या तकनीकी खराबी के कारण मुख्य गेट ऑटोमैटिक लॉक हो गया, जिससे अंदर मौजूद युवा बाहर नहीं निकल सके। सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस पूरी तीन मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग में कोई भी इमरजेंसी निकास नहीं बनाया गया था। सीढ़ियों का रास्ता बेहद संकरा था और वहां नीचे उतरने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी। जब धुआं बढ़ा तो दम घुटने के कारण कई लोग बेहोश हो गए, वहीं कई युवाओं ने जान बचाने के लिए खिड़कियों की ग्रिल तोड़कर नीचे छलांग लगा दी।
इस मामले में अब आनन-फानन में मुकदमे भी दर्ज हो गए, गिरफ्तारियां और निलंबन भी हो गए, लेकिन जो लोग मरने से बचाए जा सकते थे, वे नहीं बचाए जा सके। ऐसी वारदातें कोचिंग सेंटरों और अस्पतालों में आए दिन होती हैं। क्योंकि भारत में नगर नियोजन ही लचर है। भारत में तमाम नियम, कानूनों को धता बताकर आवासीय बस्तियों में व्यावसायिक गतिविधियां हो रही हैं। लेकिन कोई रोकने वाला नहीं। दस मंजिल कॉम्पलेक्स हैं, लेकिन 10 वाहन पार्क करने की जगह नहीं। आग बुझाने के लिए हाईडेंट नहीं। अग्निशमन के लिए न वाहन न मशीनरी और न प्रशिक्षित और जिम्मेदार अमला। देश राम भरोसे चल रहा है।
मैंने & जून को ही दिल्ली के मालवीय नगर स्थिति एक होटल में हुए अग्निकांड के बाद लिखा था कि देश के हर नगर में मालवीय नगर है। लखनऊ के इस हादसे ने मेरी बात को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया। एक हकीकत ये है कि भारत में जगह कम और आबादी ज्यादा है, लेकिन इसकी आड़ में जनजीवन से खिलवाड़ तो नहीं किया जा सकता। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भारत के फुटपाथों को लेकर एक टिप्पणी की और कहा है कि फुटपाथ पैदल चलने वालों का मौलिक अधिकार है। इसी तरह आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन भी रहवासियों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
भारत में जब तक स्थानीय निकाय अराजक तरीकों से हो रहे विकास को लेकर आंखें बंद कर काम करते रहेंगे तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे। ये एक नैतिकता से जुड़ी समस्या है और जब देश की राजनीति और सत्ता ही अनैतिक हो चुकी है तो अरण्य रोदन करते रहिए, कुछ होने वाला नहीं है।


