– राकेश अचल
देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले कभी-कभी दिल तोड़ते हैं, तो कभी-कभी दिल ठएडा भी कर देते हैं। देश में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ को मौलिक अधिकार मानकर हम जैसे असंख्य पैदल यात्रियों का दिल जीत लिया। देश में जनता के एक से अधिक मौलिक अधिकार हैं, लेकिन अधिकांश को या तो अदालत का संरक्षण नहीं मिलता या फिर उन पर अतिक्रमण कर लिया जाता है। जैसे हाल ही में बंगाल के लाखों मतदाताओं का मताधिकार कानूनी पचड़े में पड़ा, लेकिन उसे सबसे बड़ी अदालत का संरक्षण नहीं मिला था।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमू्र्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई के बाद कहा कि फुटपाथ पर चलना पदयात्रियों का मौलिक अधिकार है भारत जैसे देश में देश की राजधानी दिल्ली से लेकर किसी भी सी श्रेणी के शहर में फुटपाथ अतिक्रमण की चपेट में हैं। स्वयं स्थानीय निकाय तक फुटपाथ बनाते हैं, किंतु खुद ही फुटपाथों पर लीज दे दी है। भारत में फुटपाथ पैदल यात्रियों का मौलिक अधिकार होते हुए भी फुटपाथों पर बाकायदा छोटे कारोबारियों का अतिक्रमण है। देश मे अपवाद को छोड़ हर शहर में स्थानीय निकाय और स्थानीय पुलिस मिलकर फुटपाथ अघोषित पट्टे पर दे देते हैं। यहां तक कि राजनीतिक दल भी फुटपाथ को पैदल चलने वालों का मौलिक अधिकार मानने के बजाय अतिक्रमण करने वालों के साथ खड़े नजर आता हैं।
मैंने दुनिया के दर्जनों देशों की यात्रा की है, लेकिन फुटपाथ पर सबसे ज्यादा अतिक्रमण भारत में ही देखा। फुटपाथ बाजार देश की एक सर्वमान्य अर्थ व्यवस्था है। तमाम केन्द्र और राज्य सरकारें फुटपाथ कारोबारियों के कल्याण की योजनाएं बनाती हैं। फुटपाथ पर अतिक्रमण करने वालों को बाकायदा हितग्राही माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले को यदि सभी सरकारें ईमानदारी के साथ अमल में ले आएं और देश के हर शहर की फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त करा दें तो देश के असंख्य पैदल यात्रियों पर बहुत बड़ा उपकार हो।
मैं एक पैदल यात्री की हैसियत से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का खुले दिल से स्वागत करता हूं, किंतु मुझे आशंका है कि जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद देश की नदियों, पहाड़ों का उत्खनन आज तक नहीं रोका जा सका या जैसे देश के जंगलों को पर्यावरण की परवाह किए बिना उद्योगपतियों को लीज पर दिया जा रहा है ठीक उसी तरह फुटपाथ भी मुक्त हो पाएंगे या नहीं? भारत में फुटपाथों की कुल लंबाई का कोई आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। सड़कों की लंबाई तो दर्ज की जाती है, लेकिन फुटपाथों की अलग से राष्ट्रीय गणना नहीं होती। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों से एक अनुमान लगाया जा सकता है।
विभिन्न शहरों के अध्ययनों में पाया गया है कि केवल 15 प्रतिशत से 54 प्रतिशत सड़कों पर ही फुटपाथ मौजूद हैं। अहमदाबाद में 28, नागपुर में 54 और कई शहरों में इससे भी कम फुटपाथ हैं। यदि औसतन मान लें कि शहरी सड़कों के लगभग 30-40 प्रतिशत हिस्से पर दोनों ओर फुटपाथ बने हैं, तो भारत में फुटपाथों की कुल लंबाई मोटे तौर पर 3 से 5 लाख किमी के बीच हो सकती है। यह केवल एक अनुमान है।
देश की सबसे बड़ी अदालत जब जनहित से जुड़े किसी मुद्दे पर फैसला देती है तो उसका न सिर्फ सम्मान किया जाना चाहिए, बल्कि उस पर तत्काल प्रभाव से अमल भी करना चाहिए। मैं अक्सर अमेरिका जाता हूं और मुझे ये देखकर खुशी होती है कि अमेरिका के अधिकांश फुटपाथ अतिक्रमण मुक्त हैं। फुटपाथों पर पहला अधिकार पैदल चलने वाले का होता है। सरकार के साथ झनता भी पैदल यात्रियों के इस अधिकार का सम्मान और उसका संरक्षण करती है। कोई राजनीतिक दल फुटपाथ पर अतिक्रमण करने वालों की न पैरवी करता है और अतिक्रमणकर्ता को संरक्षण देता है। अमेरिका में तो फुटपाथ का एक तय आकार है। गुणवत्ता के फुटपाथ पैदल यात्रियों को सुख देते हैं बल्कि शहर की सुंदरता में चार चांद भी लगाते हैं।


