– राकेश अचल
याद है न! एक हुआ करते थे अरविन्द केजरीवाल। दिल्ली के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। भाजपा की बी टीम। आम आदमी पार्टी के संस्थापक भी। भाजपा का विकल्प बनने की कोशिश की तो भाजपा ने केजरीवाल को उनके फौज-फांटे के साथ शराब घोटाले में लपेट कर जेल भिजवा दिया था। होली से ठीक पहले विशेष अदालत ने केजरीवाल एंड कंपनी को दोषमुक्त कर दिया।
अदालत छोटी हो या बड़ी, जब विवेक से काम करती है तब उसका मान भी बढ़ता है, लेकिन जब अदालत के फैसले हवा का रुख देखकर किए जाते हैं तब फैसलों पर टीका-टिप्पणी भी होती है। जो संघमित्र या संघदक्ष लोग हैं उन्हें अदालत का फैसला नहीं पच रहा। वे कहते हैं केजरिया बचेगा नहीं, जांच ऐजेंसी ऊपर की अदालत में जाएगी। जाना भी चाहिए, क्योंकि हमारे यहां अपील करने की व्यवस्था है। दिल्ली की ही नहीं प्रयागराज की बड़ी अदालत ने पोस्को एक्ट के तहत आरोपी बनाए गए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। बेचारी योगी सरकार सदमे में है। सरकार का इरादा शंकराचार्य को 11 मार्च से पहले गिरफ्तार कर हवालात भिजवाने का था, ताकि वे दिल्ली में अलख न जगा सकें. माननीय अदालतों के दोनों फैसले ‘जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी, तिन तैसी’ जैसे हैं।
सियासत में अदावत के विष घोलने का काम पिछले एक दशक में युद्ध स्तर पर हुआ है। केजरीवाल, हेमंत सोरेन जैसे नेता इसके शिकार भी बने। सियासत का हौसला बढ़ा तो सत्ता ने धर्म को भी इसी विष से मारने की कोशिश की और सबसे ज्यादा मुखर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लपेटने की कोशिश की, लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान भूल गया कि शंकराचार्य जनता के वोट से चुनकर नहीं आते। वे परंपरा से आते हैं। उनका शिकार उतना आसान नहीं जितना कि नेताओं का होता है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हों या शंकराचार्य दोनों को राहत मिली है मुक्ति नहीं। केजरीवाल के खिलाफ अपील की जा सकती है तो शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर लगी रोक तीन सप्ताह बाद हट भी सकती है। अदालत के मन में कब, क्या आ जाए को नहीं जानता। हमारी अदालतों में भगवान नहीं इंसान ही बैठते हैं। हमने ही उनके हाथ में शक्तिमान बनाया है। उनमें भी मान-अपमान का भाव आता-जाता है। उनके फैसले भी बदलते रहते हैं। अदालतें कभी अपने फैसले खुद बदल चुकी हैं और जो फैसले सत्ता प्रतिष्ठान को असहज करते हैं उन्हें सरकार खुद बदल देती है।
बहरहाल अदालती फैसलों ने आम आदमी की होली तो मनवा दी। आप आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हों न हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपका आम आदमी होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। आम आदमी की आस्था कानून के राज में भी है और धर्म की सत्ता में भी। पहली बार धर्म की सत्ता से राजनीतिक सत्ता ने रार ठानी थी वो भी इसलिए कि जनता ने गलती से एक योगी को सत्ता सिंहासन तक पहुंचा दिया था। योगियों को मठों तक ही सीमित रखना चाहिए। सत्ता उन्हें भी क्रूर तथा हिंसक बना देती है। हमारे यहां कहा जाता है ‘स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते’। योगी फिलहल राजा हैं, इसलिए उन्हें उत्तर प्रदेश से बाहर कौन पूजेगा, जबकि शंकराचार्य विद्वान है वे हर जगह पूजे जाएंगे। पूजे जा रहे हैं। फिर भी अदालतों का मान-सम्मान उसके फैसलों से ही घटता-बढ़ता रहता है। आगे भी ये सिलसिला जारी रहेगा। फिलवक्त आप भी होली के उत्सव की तैयारियां कीजिए। अभी न शंकराचार्य की गिरफ्तारी हो रही है और न फिर से केजरीवाल एंड कंपनी को शराब घोटाले की आड़ में जेल भेजा जाएगा।


