भिण्ड, 31 जनवरी। राष्ट्रीय सनातन सेना भारत के नेतृत्व में सैकड़ों समर्थकों के साथ यूजीसी काले कानून के विरोध में जन आंदोलन और आयोजित प्रेसवार्ता में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह कोई राजनीतिक बयान, आरोप या विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि शिक्षा की आत्मा, संविधान की गरिमा और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।
वक्ताओं ने कहा कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में एक ऐसा मौन फैलता जा रहा है, जो शोर से अधिक खतरनाक है। यह मौन भय का है जो विद्यार्थियों को सवाल पूछने से रोकता है, स्वतंत्र सोच को दबाता है और अंतत: सीखने की पूरी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाता है। यह समय किसी एक नियम के विरोध का नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का है कि क्या हम शिक्षा को भय के हवाले करने जा रहे हैं।
प्रेसवार्ता में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह मुद्दा किसी जाति, वर्ग, समुदाय या समूह के विरुद्ध नहीं है। यह अधिकारों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन की मांग है। वक्ताओं ने कहा कि किसी वर्ग की सुरक्षा आवश्यक हो सकती है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर असंतुलन और न्याय के नाम पर एकतरफापन संविधान की मंशा नहीं हो सकता। यह लड़ाई टकराव की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और संतुलित सुधार की है। संविधान का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 21 गरिमा एवं भयमुक्त जीवन और अनुच्छेद 21ए शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। शिक्षा केवल कक्षा में उपस्थिति भर नहीं है, बल्कि वह ऐसा वातावरण मांगती है जहां विद्यार्थी निडर होकर प्रश्न पूछ सके, असहमति रख सके और यह विश्वास कर सके कि न्याय उसके साथ है। यदि किसी छात्र या शिक्षक के मन में यह भय बैठ जाए कि एक आरोप या शिकायत उसका भविष्य नष्ट कर सकती है, तो ऐसी शिक्षा अधिकार नहीं, बल्कि आशंका बन जाती है- जो संविधान की आत्मा के विपरीत है।
वक्ताओं ने नेचुरल जस्टिस के सिद्धांत पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर आरोप की निष्पक्ष सुनवाई, हर पक्ष को समान अवसर और हर निर्णय में संतुलन अनिवार्य है। किसी भी शिकायत प्रणाली की विश्वसनीयता तभी होती है जब उसमें आरोप लगाने का अधिकार हो और साथ ही झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों से बचाव का स्पष्ट मार्ग भी मौजूद हो। दंड का भय हो लेकिन निष्पक्ष जांच की गारंटी न हो, तो ऐसी व्यवस्था न्याय नहीं बल्कि मनमानी बन जाती है। प्रेसवार्ता में चेताया गया कि आज की चुप्पी कल अंधकार में बदल सकती है। शिक्षा में स्वीकार किया गया भय आगे चलकर नौकरी, प्रशासन और सामाजिक सम्मान तक फैलता है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान बच्चों और भविष्य की पीढ़ियों को होता है। जो पीढ़ी सवाल करना छोड़ देती है, वह भविष्य गढ़ने की क्षमता भी खो देती है। प्रेसवार्ता का समापन इन शब्दों के साथ किया गया कि हम किसी के खिलाफ नहीं, संविधान के साथ खड़े हैं। हम डर के नहीं, न्याय, संतुलन और भविष्य के पक्ष में खड़े हैं। यह चेतावनी नहीं, संविधान की पुकार है।
प्रशासन से रखीं यह मांगें
पत्रकार वार्ता में प्रशासन से जो मांगें रखीं गई, उनमें सभी छात्रों और शिक्षकों के लिए समान शिकायत और संरक्षण अधिकार सुनिश्चित किए जाएं। झूठी अथवा दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर न्यायसंगत, पारदर्शी और स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान हों। जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्धता को अनिवार्य किया जाए। संबंधित नियमों की पुन: समीक्षा कर उन्हें संविधान की भावना के अनुरूप संतुलित किया जाए। मीडिया और समाज से अपील की गई कि इस विषय को सनसनी के बजाय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ देखा जाए और इसे आज की राजनीति से ऊपर उठकर कल के भारत के प्रश्न के रूप में समझा जाए, क्योंकि शिक्षा से जुड़े निर्णय दशकों तक देश की दिशा तय करते हैं।
Thursday, October 1
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