– राकेश अचल
भारत के सहयोग से बने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश के इंटर नेशनल क्राइम ट्रिब्युनल ने फांसी की सजा सुना तो दी, लेकिन क्या शेख हसीना को फांसी दे पाना बांग्लादेश की कठपुतली सरकार के लिए मुमकिन होगा, क्योंकि शेख हसीना विश्वगुरू भारत की पनाह में हैं।
लगभग दो दशक तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना के खिलाफ जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों के कोटे के खिलाफ शुरू हुए छात्र आंदोलन ने जल्द ही व्यापक विरोध प्रदर्शन का रूप ले लिया। सरकार पर भ्रष्टाचार और लोकतंत्र का दमन करने के आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस दमन में लगभग 1400 लोग मारे गए। 5 अगस्त 2024 में हसीना को पद छोड़ना पड़ा। वे हेलीकॉप्टर से भागकर भारत पहुंच गईं, जहां वे वर्तमान में रह रही हैं।
बंग बंधु के नाम से लोकप्रिय बांग्लादेश के संस्थापक और पहले प्रधान शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी शशेख हसीना के भारत आने के बाद अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (जो कि बांग्लादेश की घरेलू अदालत है) ने हसीना और उनके पूर्व गृह मंत्री आसदुज्जमां खान कमाल पर मानवता के खिलाफ अपराधों का मुकदमा चलाया। दोनों पर हत्या के आदेश देना, उकसाना और अत्याचार रोकने में विफलता के आरोप लगाए गए। इसी ट्रिब्यूनल ने 17 नवंबर 2025 को शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई। यह सजा हसीना की अनुपस्थिति में दी गई, क्योंकि वे अदालत में पेश नहीं हुईं। गृह मंत्री को भी मौत की सजा मिली, जबकि एक पूर्व पुलिस प्रमुख को 5 वर्ष की कैद की सजा दी गई है।
अदालत ने 453 पृष्ठों के फैसले में हसीना को मास्टर माइंड बताया। ऑडियो रिकार्डिंग्स से प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देशों का प्रमाण मिला। बांग्लादेश सरकार ने भारत से हसीना और कमाल के प्रत्यर्पण की मांग की है। हालांकि, भारत ने प्रत्यर्पण से इंकार करते हुए कहा है कि हम लोकतंत्र के साथ हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है।
फैसले को नकारते हुए शेख हसीना के पुत्र ने चेतावनी दी कि उनकी पार्टी (आवामी लीग) पर प्रतिबंध हटाने की मांग पूरी न होने पर हिंसा हो सकती है। लंदन में उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन भी किया, लेकिन ढाका में फैसले पर तालियां गूंजीं। छात्रों ने उनके पैतृक घर को तोड़ने की कोशिश की। बांग्लादेश कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ने सजा को एकतरफा और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। मानवाधिकार संगठनों ने मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। यह फैसला फरवरी 2026 के चुनावों से पहले आया है। अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने इसे ऐतिहासिक कहा।
आपको बता दूं कि 28 सितंबर 1947 को जन्मी शेख हसीना जून 1996 से जुलाई 2001 तक और फिर जनवरी 2009 से अगस्त 2024 तक बांग्लादेश की दसवीं प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। वह बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जो बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति भी थे। कुल 20 वर्षों से अधिक के कार्यकाल के साथ वह बांग्लादेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली प्रधानमंत्री और दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली महिला सरकार प्रमुख हैं।
न्यायाधिकरण के फैसले के बाद शेख हसीना की पार्टी बांग्लादेश आवामी लीग ने पूर्व पीएम की तरफ से एक विस्तृत बयान जारी किया है। इसमें हसीना ने अपने ऊपर लगाए गए सारे आरोपों से इन्कार किया है और न्यायाधिकरण के फैसले को पक्षपातपूर्ण व राजनीति से प्रेरित बताते हुए कहा है कि कोर्ट में मुझे अपने पक्ष को रखने का मौका नहीं दिया गया और ना ही मेरी अनुपस्थिति में मेरे किसी प्रतिनिधि वकील को पेश होने दिया गया। दुनिया का कोई भी सम्मानित न्यायिक निकाय इस न्यायाधिकरण की अनुशंसा नहीं करेगी। इसका एकमात्र उद्देश्य लोकतांत्रिक तरीके से चयनित एक सरकार के खिलाफ बदला लेना और बांग्लादेश आजादी व स्वतंत्रता को रोकना है। शेख हसीना ने मोहम्मद युनूस के बारे में कहा है कि उन्होंने अतिवादी ताकतों की मदद से गलत तरीके से सत्ता हासिल किया है। शेख हसीना ने अगले साल होने वाले आम चुनाव को पारदर्शी व निष्पक्ष कराने की मांग भी की है।
भारत के पड़ौस में इससे पहले जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं, जिन्हें साजिश के तहत फांसी पर लटका दिया गया था। जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तान के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। भारत में पिछले 80 साल में कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति इस तरह से न गिरफ्तार हुआ और न उसे किसी तरह की सजा सुनाई गई।


