✍️डॉ मनोज जैन
वैसे तो अब मानसून की विदाई का समय आ रहा है। लेकिन विदा होते-होते चंबल की सहायक नदियों के ऊपरी क्षेत्रों में बारिश लगातार बढ़ रही है और कुंवारी तथा सिंध उफान पर चल रही हैं। चंबल के बीहड़ों में घूमने के लिए यह मौसम अपने साथ बहुत कुछ लेकर आता है और जाते-जाते भी बहुत कुछ छोड़ जाता है। बारिश के बाद बीहड़ में केवल नजारा ही नहीं बदलता, नजर भी बदल जाती है।
पूरे चंबल क्षेत्र में अब तेंदुओं का कुनबा बढ़ रहा है। बारिश के बाद रास्ते के आसपास की झाड़ियां भी घनी हो जाती हैं। इन घनी झाड़ियों के पीछे से पता नहीं कहां कोई तेंदुआ हम पर नजर रख रहा हो। चंबल में तेंदुओं की वापसी कई दशकों बाद हुई है, इसलिए बीहड़ में चलते हुए यह संभावना हमेशा रोमांच पैदा करती है कि अगले कगार के पीछे क्या दिखाई दे जाए। अन्य वर्षा वनों और ऐसे जंगलों में, जहां ऊंचे और घने पेड़ होते हैं, लंगूर और हिरण जैसे जानवर भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। वहां शेर, बाघ, चीता या तेंदुआ दिखाई दे तो लंगूर की चेतावनी की आवाज पूरे जंगल को खबर कर देती है। उसके आसपास हिरण भी चौकन्ने हो जाते हैं। यानी जंगल में शिकारी की मौजूदगी छिपी नहीं रह पाती।
चंबल के बीहड़ का मामला थोड़ा अलग है। यहां न तो लंगूर आसानी से मिलते हैं और न हिरण। बबूल की कांटेदार झाड़ियों में लंगूर के लिए रहना आसान नहीं है और घास की कमी के कारण हिरण के लिए भी पर्याप्त भोजन नहीं है। ऐसे में चंबल का तेंदुआ अपने स्वभाव के अनुसार चुपचाप छिपा रहता है और अचानक कहीं से सामने आ सकता है। फिर भी बीहड़ में ट्रैकिंग का अपना आनंद है। घनी झाड़ियों, कगारों और खंतियों के बीच चलते हुए हर कदम के साथ यह उत्सुकता बनी रहती है कि आगे क्या मिलने वाला है। इसी हरियाली के बीच पक्षियों की आवाजें भी लगातार सुनाई दे रही हैं। चंबल का यह बदला हुआ रूप केवल आंखों से नहीं, कानों से भी महसूस किया जा सकता है। चंबल में चलते हुए मेरा ध्यान अक्सर पक्षियों की आवाजों की ओर चला जाता है। यहां रास्ता हमेशा सामने दिखाई देने वाला रास्ता नहीं होता। कभी कगार के ऊपर से आगे बढ़ना पड़ता है, कभी खंती में उतरना पड़ता है और कभी झाड़ियों के बीच से निकलती पगडंडी पकड़नी पड़ती है। चलते-चलते अचानक कोई आवाज सुनाई दे तो कदम अपने आप रुक जाते हैं। मानसून के इन दिनों में ऐसी ही आवाजों में चातक और पपीहे की आवाजें विशेष रूप से ध्यान खींच रही हैं। इन दोनों पक्षियों का नाम लेते ही बारिश और बादल याद आने लगते हैं। हमारे साहित्य और लोकजीवन में भी इन दोनों का मानसून से गहरा संबंध रहा है। हिंदी फिल्मों ने भी पपीहे की आवाज को अपने गीतों में जगह दी है। पपीहे का नाम आते ही अनायास “बोले रे पपीहरा” की मधुर आवाज कानों में गूंजने लगती है। लेकिन चंबल की प्रकृति को थोड़ा करीब से देखने पर पता चलता है कि चातक और पपीहा दो अलग पक्षी हैं और मानसून से उनका रिश्ता भी अलग है।
चातक की यात्रा
चातक को लेकर हमारे यहां एक बहुत सुंदर मान्यता है कि वह केवल आसमान से गिरने वाली बारिश की बूंद पीता है। विज्ञान इस बात की पुष्टि नहीं करता, लेकिन सदियों से चली आ रही यह मान्यता चातक को बारिश का पक्षी बना चुकी है।वास्तविकता यह है कि मध्य और उत्तरी भारत में दिखाई देने वाला चातक मानसून के आसपास अफ्रीका से भारत आता है और मानसून समाप्त होने के बाद वापस लौट जाता है। यानी चातक वास्तव में एक लंबी यात्रा करने वाला पक्षी है। चंबल के बीहड़ों में मानसून के इन दिनों में चातक को देखना इसलिए भी अलग अनुभव है कि सामने दिखाई देने वाला यह छोटा-सा पक्षी कुछ ही समय बाद हजारों किलोमीटर दूर जाने वाला है। वैज्ञानिकों ने उपग्रह आधारित निगरानी से चातक की इस यात्रा को दर्ज किया है। एक चातक की भारत से अफ्रीका तक लगभग पांच हजार किलोमीटर की यात्रा सामने आई है। अरब सागर के ऊपर से होने वाली यह यात्रा अपने आप में अद्भुत है। बीहड़ में चलते हुए कभी-कभी मन में आता है कि जिस पक्षी को हम कुछ क्षण के लिए अपने सामने देख रहे हैं, उसके लिए चंबल केवल एक जगह नहीं, बल्कि उसकी लंबी यात्रा का एक पड़ाव है।

पपीहा भी मानसून से जुड़ा हुआ पक्षी है, लेकिन उसकी कहानी चातक जैसी नहीं है। आम बोलचाल में दोनों को कई बार एक ही समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अलग पक्षी हैं। पपीहा मुख्यतः भारत में रहने वाला पक्षी है। वह चातक की तरह अफ्रीका से मानसून के साथ आने वाला प्रवासी पक्षी नहीं है। मानसून से उसका संबंध उसकी पुकार और प्रजनन काल की गतिविधियों से अधिक है। चंबल में पपीहे को कई बार पहले सुनना पड़ता है, फिर देखना। उसकी आवाज दूर से आती है और कुछ देर के लिए पूरा ध्यान उसी दिशा में चला जाता है। झाड़ियों और पेड़ों के बीच उसे तलाशते हुए कई बार वह दिखाई नहीं देता, लेकिन उसकी उपस्थिति महसूस होती रहती है। मुझे पक्षियों की यही बात अच्छी लगती है। वे हर बार सामने आकर अपना परिचय नहीं देते। कुछ केवल अपनी आवाज से बताते हैं कि वे आसपास हैं। पपीहे की पुकार मानसून की एक ऐसी ही पहचान है।
चंबल में मौसम को सुनना
चंबल में घूमते हुए धीरे-धीरे यह महसूस होता है कि यहां मौसम केवल दिखाई नहीं देता, सुनाई भी देता है। बारिश के बाद कगारों और खंतियों के आसपास हरियाली बढ़ रही है। झाड़ियों में हलचल बढ़ रही है और पक्षियों की आवाजें वातावरण को बदल रही हैं। ऐसे में चलते हुए कभी नजर सामने होती है और कभी कान किसी आवाज की दिशा में चले जाते हैं। मानसून अब विदा हो रहा है। चातक के लिए यह विदाई एक लंबी यात्रा की शुरुआत है। पपीहा यहीं रहेगा, लेकिन उसकी पुकार के साथ जुड़ी मानसून की स्मृति धीरे-धीरे पीछे छूट जाएगी। चंबल की मेरी यात्राओं में ऐसे ही छोटे-छोटे अनुभव जमा होते जा रहे हैं। कभी कोई पक्षी सामने आता है, कभी केवल उसकी आवाज मिलती है और कभी कोई अनदेखी आवाज पूरे रास्ते के साथ चलती रहती है। शायद यही चंबल की खूबसूरती है। यहां प्रकृति हमेशा सामने आकर अपनी कहानी नहीं सुनाती। कभी वह किसी कगार पर दिखाई देती है, कभी किसी खंती की हरियाली में और कभी किसी अनदेखे पक्षी की आवाज में। मानसून विदा हो रहा है। चातक अपनी लंबी यात्रा पर लौट रहा है। पपीहा यहीं रह रहा है, लेकिन उसकी मानसूनी पुकार धीरे-धीरे पीछे छूट रही है। और मेरे लिए चंबल की इस मानसूनी यात्रा की स्मृति में शायद सबसे देर तक वही आवाजें रहने वाली हैं—चातक की उपस्थिति और पपीहे की पुकार। यही तो है मेरी चंबल डायरी—जहां हर मौसम अपने साथ एक कहानी लेकर आता है और जाते-जाते अगली यात्रा के लिए कोई आवाज छोड़ जाता है।


