भिण्ड ब्यूरो – आज चहुंओर जातिगत आंदोलन के हालत बनते जा रहे हैं जो देश के वर्तमान परिदृश्य अनुसार गंभीर व चिंताजनक नजर आ रहे है।भाजपा नेता अर्पित मुद्गल ने इस विषय पर अपनी टिप्पणी करते हुए कहा कि
मेरी राय में “आरक्षण हटाओ” से ज्यादा सार्थक और संवैधानिक बहस “आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे जरूरतमंद और वंचित लोगों तक कैसे पहुँचे” इस पर होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण (sub-classification) को बहुमत से अनुमति दी, ताकि अधिक पिछड़े समूहों तक आरक्षण का लाभ बेहतर ढंग से पहुँच सके। कोर्ट ने राज्यों से इसके लिए पर्याप्त आधार आंकड़ों की आवश्यकता भी बताई। हालाँकि एक जरूरी अंतर है,जिसमें SC/ST में “creamy layer” अभी OBC की तरह लागू व्यवस्था नहीं है। 2024 के फैसले में कुछ न्यायाधीशों ने SC/ST के भीतर क्रीमी लेयर की पहचान और उसे affirmative action से बाहर करने के लिए नीति बनाने की बात कही थी; यह अपने-आप में मौजूदा केंद्रीय नियम बन जाने के बराबर नहीं है।
इसलिए मुझे सबसे संतुलित मांग यह लगती है:
आरक्षण खत्म नहीं—आरक्षण का लाभ सही व्यक्ति तक।
जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित है, उसे प्राथमिकता मिले।
जो समुदाय/वर्ग लंबे समय से लाभ से वंचित रह गया है, उसके लिए बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।
और पूरी व्यवस्था पारदर्शी, आंकड़ों पर आधारित तथा संविधानसम्मत हो।
यानी बहस “आरक्षण बनाम आरक्षण-विरोध” की नहीं, बल्कि “न्यायपूर्ण और प्रभावी आरक्षण” की होनी चाहिए।


