– राकेश अचल
मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भूमाफिया हैं या लोकसेवक ये खुद मुख्यमंत्री को जनता के इजलास में हाजिर होकर बताना पड़ेगा, क्योंकि उनके ऊपर करोड़ों की जमीन खरीदने का आरोप है। मुख्यमंत्री पर जमीन घोटाला के आरोप किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने लगाए हैं। मुख्यमंत्री पद पर ढाई साल से काम कर रहे मोहन यादव द्वारा की गई इस खरीद-फरोख्त के रहस्योदघाटन को सुपारी पत्रकारिता कहा जा रहा है। ये कहने वाले लोग मोहन मीडिया के लोग हैं।
उज्जैन और आस-पास के इलाके में अपने पूरे कुनवे के नाम से जमीन खरीदने के आरोपी मुख्यमंत्री मौन हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल भी इस रहस्य का उदघाटन करने वाले इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की है, वे कांग्रेस पर बरस रहे हैं। जबकि कांग्रेस ने इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर को ही टूल की तरह इस्तेमाल किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को मैं तब से जानता हूं जब वे उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बनाए गए थे। उन्हें जमीनों के धंधे का चस्का तभी से लगा। अन्यथा उनका पुस्तैनी धंधा रेस्टॉरेंट का था। वे चाय, पोहा बेचा करते थे। भू प्रेमी तो बाद में बने। इसी भू क्षुधा की वजह से वे आज कटघरे में हैं।
भाजपा का सबसे समृद्ध एटीएम माने जाने वाले डॉ. मोहन यादव को खाने और खिलाने की छूट पार्टी हाईकमान से मिली है। यदि ऐसा न होता तो वे जमीन के धंधे मे शायद हाथ ही न डालते। अब चूंकि मोहन यादव ने एटीएम बननी स्वीकार कर ही लिया है तो वे निडर भी है और उन्होंने सिंहस्थ से पहले अपने धंधे को चमकाने का अभियान जारी रखा। मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि डॉ. मोहन यादव के खिलाफ पार्टी हाईकमान कोई कार्रवाई नहीं करेगी। न कोई मुकदमा कायम होगा, न कोई एस आईटी गठित की जाएगी। बल्कि मुख्यमंत्री के खिलाफ ये सब कराने वालों पर कोई कार्रवाई होगी?
आपको बता दूं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव का भूमि प्रेम ऐसा जागा कि उन्होंने भोपाल की जगह उज्जैन को ही अघोषित रूप से मप्र की राजधानी बना दिया। वे दिनभर चाहे कहीं रहें, लेकिन घूम-फिर कर रात को उज्जैन पहुंच ही जाते हैं। मोहन बाबू ने कभी भी अपने परिवार को भोपाल के मुख्यमंत्री निवास में नहीं रखा। मैंने एक बार इसी बात को लेकर मुख्यमंत्री यादव की तारीफ की थी और लिखा था कि मोहन बाबू ने शिवराज सिंह चौहान की तरह मुख्यमंत्री आवास को समानांतर सचिवालय नहीं बनाया, उनकी पत्नी ने वहां एटीएम नहीं लगाए। तो उज्जैन के एक पत्रकार मित्र ने मुझसे उज्जैन आकर हकीकत का पता करने की सलाह दी थी।
बहरहाल ताजा भूमि विवाद में डॉ. मोहन यादव अकेले नहीं हैं। पार्टी ने उन्हें फौरी तौर पर संरक्षण दिया है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री का बचाव किया है। कुछ लोगों ने इस मुद्दे पर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी पर भी छींटाकसी की है कि जब ये सब हो रहा था, तब वे कहां सो रहे थे? सवाल ये है कि प्रदेश में भूमाफियाओं के खिलाफ मुहिम चलाने का दावा करने वाली भाजपा अब कितने दिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का बचाव कर पाएगी? यादव विरोधियों ने तो उनके हटाए जाने की उल्टी गिनती गिनना भी शुरू कर दी है।
प्रदेश में जमीन से प्रेम करने वाले डॉ. मोहन यादव अकेले भाजपा नेता नहीं हैं। उन्हीं की तरह भाजपा के सिंधिया घराने को भी जमीन से बेतहाशा लगाव है। पिछले दो दशक में इस घराने ने सैकड़ों एकड़ जमीन को अपना बताकर सरकारी अधिपत्य से मुक्त कराकर अपनी मिल्कियत बनाया है। भाजपा के दो बड़े नेता जयभान सिंह पवैया और स्व. प्रभात झा, सिंधिया को प्रदेश का सबसे बड़ा भूमाफिया बता चुके हैं। किंतु इन बेचारों को डॉ. मोहन यादव के भूलोक के बारे में शायद माहिती नहीं थी।


