– राकेश अचल
भारत में सनातन का भूत कहिये या सनातन की सनक अब सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे मशहूर और ऐतिहासिक धरोहरों में से एक मोहन जोदड़ो की डांसिंग गर्ल की मूर्ति आज एक बार फिर कट्टर पंथियों के निशाने पर है।
आपको बता दूं कि ये नृत्यकृति 10.5 सेंटीमीटर की है। यह छोटी सी कांसे की मूर्ति आज से करीब 4500 साल पहले लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग (मोम की ढलाई) तकनीक से बनाई गई थी। साल 1926 में जब ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता अर्नेस्ट मैके को मोहन जोदड़ो में खुदाई के दौरान यह मिली, तब से लेकर आज यानी साल 2026 तक इस मूर्ति को देखने, समझने और इसकी व्याख्या करने के नजरिए में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।
इस मूर्ति को लेकर ताजा बहस हाल ही में एनसीईआरटी की किताबों में इसके चित्रण और सेंसरशिप को लेकर शुरू हुई है और दूसरी है इसकी सनातन बहस जो दशकों से इसके धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अस्तित्व को लेकर चली आ रही है। यह मूर्ति एक तरह से अंधों का हाथी है। किसी को यह नाचने वाली अल्हड़ लड़की लगती है, तो कोई इसे आदि-पार्वती का रूप में देखता है। किसी को यह मातृत्व की प्रतीक मदर गॉड नजर आती है।
यह डांसिंग गर्ल एक बार फिर तब सबसे बड़े विवादों में घिर गई, जब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत कक्षा 9वीं के लिए कला शिक्षा की अपनी पहली नई किताब मधुरिमा जारी की। इस किताब के पहले अध्याय इतिहास की कलाएं में इस ऐतिहासिक मूर्ति की एक ऐसी तस्वीर छापी गई है, जिसमें उसका धड़ धुंधला किया हुआ दिखाई देता है। मूर्ति से वक्ष और गुप्तांग के उभार हटा दिए गए हैं। ऐसा लगता है कि जैसे मूर्ति के नग्न स्वरूप को ढकने के लिए उसे कपड़े पहना दिए गए हों या उसे छुपाया गया हो। मजे की बात यह है कि पिछले ढाई दशक से अधिक समय से यह मूर्ति परिषद की इतिहास की किताबों में अपने मूल स्वरूप में छपती आ रही थी। यहां तक कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी इसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की गई।
इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने खुलासा किया कि परिषद इस स्टैच्यू की तस्वीर को इंडस वैली सिविलाइजेशन वाले चैप्टर की कवर इमेज बनाने से हिचकिचा रहा था, क्योंकि वह नग्न है और विवाद का कारण बन सकती है। डैनिनो के अनुसार अगर हम बच्चों को इतिहास का मूल रूप नहीं दिखा सकते तो फिर उन्हें नेशनल म्यूजियम जाने से भी रोक देना चाहिए, जहां यह मूल मूर्ति और इसके जैसी कई अन्य देवियों व अप्सराओं की अर्ध-नग्न मूर्तियां रखी हुई हैं।
एनसीईआरटी का कहना है कि ऐसा जान-बूझकर नहीं किया गया है और मामले को समीक्षा के लिए टीम के पास भेज दिया गया है। डांसिंग गर्ल को लेकर चल रही ताजा बहस और सनातन बहस में एक गहरा अंतर्विरोध और समानता है। सनातन बहस इस बात को लेकर थी कि औपनिवेशिक इतिहासकारों ने भारत की एक गौरवशाली नारी आकृति को सिर्फ एक निर्वस्त्र नाचने वाली लड़की के रूप में सीमित कर दिया, जबकि वह कोई पूजनीय देवी या समाज की मार्गदर्शक हो सकती थी।
आज की ताजा बहस रूढ़िवादिता और सेंसरशिप के बीच फंसी है। मेरे खयाल से इतिहास को वैसे ही देखा जाना चाहिए जैसा वह था, न कि उसे आज के नैतिक मापदंडों के हिसाब से तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाए। इतिहासकार ठीक ही कहते हैं कि कलाकृति का पेट या धड़ छुपाना असल में इतिहास की उस सच्चाई को छुपाना है जो यह बताती है कि 4500 साल पहले का भारतीय समाज कला, शरीर और अभिव्यक्ति को लेकर कितना सहज, प्रगतिशील और आधुनिक था।
यह ऐतिहासिक मूर्ति 1926 में मोहन जोदड़ो (जो अब पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है) में एक घर की खुदाई के दौरान मिली थी। विभाजन के बाद हुए समझौतों के तहत यह मूर्ति भारत के हिस्से में आई और अब नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखी हुई है। मूर्ति पूरी तरह नग्न है, लेकिन उसने अपने बाएं हाथ में कंधे से लेकर कलाई तक लगभग 24-25 चूड़ियां पहन रखी हैं और दाएं हाथ में केवल 4 चूड़ियां या कंगन हैं। उसके गले में तीन बड़े पेंडेंट वाला एक हार है।
सवाल ये है कि आज की सनातनी सोच क्या डांसिंग गर्ल के बाद खजुराहो के मन्दिरों को चादरों से ढक देगी? हमारी शिल्पकला के साथ ये तालिबानी रवैया आखिर क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है? मोहन जोदाड़ों में मिली या बाद में बनाई गई धातु, पत्थर और काष्ठ प्रतिमाओं को कपडे पहनाकर किस मानसिकता का परिचय दिया जा रहा है? देश में ग्यारसपुर की शाल भंजिका, बिहार की धोबिनी जैसी चर्चित प्रतिमाएं तो इस लिहाज से नष्ट कर देना चाहिए। खजुराहो के मन्दिरों पर बनी रतिक्रिया की प्रतिमाओं को काटकर फेंक देना चाहिए। मुमकिन है कि भाजपा सरकार नारी वंदन के तहत आने वाले कल में ये सब कर गुजरे। सवाल ये है कि एनसीईआरटी क्या देश के नागा साधु समुदाय को भी कपड़ा पहना सकेगा या उसका जोर मूक डांसिंग गर्ल पर ही चल सकता है।


