– राकेश अचल
मध्य प्रदेश की राजनीति का एक नाम जो दशकों से सत्ता, संगठन और विवाद तीनों का केन्द्र रहा है, वह है दिग्विजय सिंह। कभी मिस्टर बंटाधार के नाम से आलोचना, तो कभी संगठन के मजबूत रणनीतिकार के रूप में पहचान, उनकी राजनीति आज भी कांग्रेस के भीतर एक बड़ा सवाल है और इस समय जब कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं मल्लिकर्जुन खड़गे। तो सवाल उठता है— क्या दिग्विजय सिंह अब भी राष्ट्रीय नराजनीति में प्रासंगिक हैं?
संगठन में भूमिका और हकीकत
दिग्विजय सिंह अब चुनावी राजनीति से अधिक संगठनात्मक और वैचारिक भूमिका में दिखते हैं। वे मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव भी रह चुके हैं। कांग्रेस के विचारधारा आधारित नेताओं में उनकी गिनती पुराने और नए कार्यकर्ताओं के बीच पुल की भूमिका में है, लेकिन निर्णय केन्द्र से दूरी भी बढ़ी हैयह दूरी हाशिए का संकेत है या रणनीतिक पीछे हटना-यह बहस का विषय है।
खड़गे नेतृत्व और शक्ति केन्द्र
खड़गे के नेतृत्व में कांग्रेस ने संगठन को अनुशासित करने की कोशिश की है। निर्णय अब कोर टीम आधारित क्षेत्रीय नेताओं की स्वतंत्रता सीमित। वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सलाहकार जैसी है। ऐसे में सवाल उठता है क्या दिग्विजय सिंह जैसे नेता प्रभावी निर्णय केन्द्र में रह पा रहे हैं?
संगठन और स्थानीय नेतृत्व संघर्ष
राज्यों में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा बदल रहा है। हरीश चौधरी जैसे युवा और सक्रिय नेताओं की भूमिका बढ़ रही है। यहीं टकराव पैदा होता है। इसका नुकसान दिग्विजय को कम संगठन को ज्यादा हो रहा है। अनुभव बनाम नई कार्यशैली, वैचारिक नेतृत्व बनाम मैनेजमेंट राजनीति और पुराने चेहरों की भूमिका का पुनर्निर्धारण।
क्या दिग्विजय राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकते हैं?
यह संभावना बेहद कम मानी जाती है, लेकिन राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। संभावना ये है कि संगठन में गाइडिंग थिंक टैंक की भूमिका राज्यसभा/ राष्ट्रीय मुद्दों तक सीमित प्रभाव या फिर केवल वैचारिक वक्ता की भूमिका। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी अब मैनेजमेंट+चुनावी प्रदर्शन दोनों मांगती है। कहने का तात्पर्य ये है कि दिग्विजय सिंह न तो पूरी तरह हाशिए पर हैं, न ही निर्णायक शक्ति केन्द्र में। वे आज कांग्रेस में एक ऐसे नेता हैं जिनका अनुभव अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन जिनकी राजनीतिक पकड़ पहले जैसी नहीं रही और यही भारतीय राजनीति की असली कहानी है- नेता बदलते नहीं, उनकी भूमिका बदल जाती है।
दिग्विजय सिंह में नायक भी है, खलनायक भी और जन नायक भी। वे दोस्तों के दोस्त और दुश्मनों के दुश्मन हैं। वे कांग्रेस की तीन पीढ़ियों के साथ काम कर चुके हैं। उनके चाहने वाले जितने कांग्रेस में हैं उतने ही भाजपा में भी। बहुत से लोग हैं जो दिग्विजय सिंह को हमेशा संदेह की नजर से देखते हैं। मप्र में कांग्रेस की दुर्दशा के लिए भी दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार मानने वालों की कमी नहीं।


