– राकेश अचल
भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की ब्रिटेन यात्रा के दौरान लंदन में उनकी भागीदारी वाले एक कार्यक्रम में बवाल हुआ है। इस कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने भारत में असहमति को लेकर चिंताओं और उनके हालिया कॉकरोच वाले बयान पर उनसे सवाल किए। इससे पहले नार्वे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी सवालों से भाग खड़े हुए थे।
अभी 4 जून को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इंग्लैंड में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेशनल लॉ’ पर भाषण दिया था। इस कार्यक्रम में सवाल-जवाब के सेशन के दौरान, एक व्यक्ति ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत से भारत के लोकतांत्रिक रिकार्ड और असहमति के प्रति बढ़ती नफरत के बारे में सवाल पूछने की कोशिश की। ऑनलाइन वायरल हो रहे वीडियो क्लिप में उस व्यक्ति को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि हम देश और विदेश के कई कानूनी जानकारों से सुन रहे हैं कि भारत में असहमति के प्रति बढ़ती नफरत को लेकर काफी चिंता है। और ऐसा लगता है कि यह नफरत जज साहब के भाषण में भी कुछ हद तक झलकती है। एक और व्यक्ति ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत से 15 मई को कोर्ट में दिए गए उनके उस बयान के बारे में सवाल पूछना चाहा, जिसने बाद में भारत में काफी बहस छेड़ दी थी।
जाहिर है कि सवाल कोकरोच को लेकर ही रहा होगा। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत यदि सवालों का धैर्यपूर्वक जबाब देते तो मुमकिन है कि न हंगामा होता और न भारत को सवालों से बचने वाला देश माना जाता। अप्रिय यह रहा कि इसके बाद कार्यक्रम को बाधित करने की कोशिश की गई। चर्चा के दौरान कुछ लोग खड़े हो गए और इशारे करने लगे।
ब्रिटेन में भारतीय हाई कमीशन ने इस हंगामे की आलोचना की और इसमें शामिल लोगों के व्यवहार को अनुचित बताया। एक बयान में हाई कमीशन ने कहा कि 4 जून के इवेंट में लेक्चर के बाद अच्छी चर्चा हुई थी, लेकिन फिर एक व्यक्ति ने कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश की। बयान में कहा गया कि इस तरह का अशोभनीय व्यवहार स्वीकार्य नहीं है और यह सार्वजनिक बातचीत में जरूरी सम्मानजनक व्यवहार के खिलाफ है। लोकतांत्रिक समाज में विचारों का अलग-अलग होना स्वाभाविक है। हालांकि, उन्हें सभ्य और सम्मानजनक तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए।
आपको याद होगा कि इससे पहले नार्वे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक महिला पत्रकार के सवाल से कन्नी काटी थी। तब भी तरह-तरह की बातें हुई थीं। दुनिया ने सवालों से भागती भारत की ये पीढ़ी पहली बार देखी है। मोदीजी सवालों से कन्नी काटें तो समझ में आता है किंतु यदि सीजेआई भी मोदी का अनुशरण करते दिखें तो हैरानी होती है। पिछले 50 साल में मैंने इन्दिरा गांधी, पीवी नरसिम्हाराव, वीपी सिंह, राजीव गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह, देवगौड़ा, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी बाजपेई जैसे प्रधानमंत्रियों से सवाल किए और जबाब पाए, लेकिन मोदीजी की परछाई तक नहीं छू सका। सवाल करना तो दूर की बात है।
परदेसी इस हकीकत से वाकिफ नहीं है। भारत में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आज तक अपने किसी विदेशी दौरे में सवालों से कन्नी नहीं काटी। उल्टे जबाब देने पर भारत में उन्हें अदालतों में घसीटा जा रहा है। असल सवाल है कि प्रश्नाकुल भारतीय समाज की उत्तर देने की क्षमता अचानक कैसे गायब हो गई। हमारे यहां तो गीता की रचना ही अर्जुन की प्रश्नाकुलता की वजह से हुई। कल्पना कीजिये कि यद योगिराज कृष्ण अर्जुन के तमाम प्रश्नों को अनसुना कर देते तो क्या गीता की रचना हो पाती?


