– राकेश अचल
दुनिया जंग लड़ रही है, लेकिन भारत में सरकार हमेशा की तरह चुनाव लड़ रही है और चुनाव जीतने के लिए ही सरकार ने संसद के बजट सत्र का एक्सटेंशन करने का एकतरफा निर्णय कर लिया। सरकार अपने निश्चित उद्देश्य के लिए संसद के दोनों सदनों की बैठक 16 अप्रैल से फिर शुरू होगी। दोनों सदनों में 17 और अप्रैल को भी कार्रवाई चलेगी। संसद की इन तीन बैठकों के दौरान सरकार महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन बिल पारित कराएगी।
आपको शायद याद हो कि सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक (जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला वंदन विधेयक भी कहा जाता है) सितंबर 2023 में संसद द्वारा पारित कराया था। 20 सितंबर 2023 को लोकसभा ने भारी बहुमत से पारित इस विधेयक को राज्यसभा ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया था। 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस पर हस्ताक्षर किए और गजट नोटिफिकेशन जारी हुआ। इससे लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है (एससी/ एसटी कोटे में भी महिलाओं के लिए आरक्षण शामिल)। यह आरक्षण सीमा पुनर्निर्धारण के बाद लागू होना है। जो अगली जनगणना के बाद होगा। पहले 1996 से कई बार प्रयास हुए थे, लेकिन 2010 में केवल राज्यसभा में पारित हो सका था, लोकसभा में नहीं।
गौरतलब है कि सरकार ने 2029 के आम चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण की मंशा जताते हुए इसके संकेत दे दिए थे। विपक्षी दलों ने पांच राज्यों में चल रहे चुनाव के बाद इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने और इसके बाद संसद की बैठक बुलाकर इसे लागू करने की मांग सरकार से की थी। सुबह राज्यसभा में इसे लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तल्ख और गर्मा-गर्म तकरार भी देखने को मिली थी।
कांग्रेस के चीफ व्हिप जयराम रमेश ने चुनाव के बीच ऐसा करने को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया था। उन्होंने चुनाव बाद यह बिल लाने की अपील करते हुए कहा था कि जब यह बिल संसद से पारित हुआ था, विपक्ष ने तभी इसे तत्काल लागू करने की मांग की थी। तब सरकार ने जनगणना से परिसीमन तक बाध्यताएं गिना इसे तुरंत लागू करने से इनकार कर दिया था। अब तमिलनाडु और बंगाल में चुनाव हैं, तब इनको इस बिल की याद आई है।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के चलते इस विधेयक को बाहर निकालने का मतलब ही इसका राजनीतिक लाभ लेना है, क्योंकि इसका झुनझुना बजाया जा सकता है। इस पर अमल नहीं किया जा सकता। क्योंकि अभी न जनगणना शुरु हुई है और न ही परिसीमन। मजे की बात ये है कि 16 अप्रैल को प्रश्नकाल, शून्यकाल और प्राइवेट मेंबर्स का समय नहीं होगा. केवल सरकारी कार्य होगा। भाजपा महिला आरक्षण विधेयक का राग अलाप कर बंगाल और तमिल फतह करना चाहती है। दक्षिण और पूर्व के राज्य विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा के पास कोई अमोघ अस्त्र बचा नहीं है। ऐसे में महिला आरक्षण का ये झुनझुना कितना लाभकारी साबित होगा, ये कहना अभी कठिन है।


