– राकेश अचल
खाड़ी युद्ध के 24वें दिन एक अच्छी खबर आई कि महाबली अमेरिका ने एक तरफ पांच दिवसीय युद्ध विराम की घोषणा कर दी। मजे की बात ये है कि पहली बार युद्ध विराम से पीड़ित देश इन्कार कर रहा है। खाड़ी युद्ध की वजह से भारत में कोविडकाल जैसे हालात बन गए हैं। मुझे लग रहा था कि ईरान पर हमलाक करने वाले इजराइल और अमेरिका जंग से पीछे नहीं हटेंगे और यदि हटे भी तो युद्ध विराम का ऐलान तेल अबीब या वाशिंगटन के बजाय दिल्ली से होगा, लेकिन ये हो न सका। उल्टे भारत की संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी को कहना पड़ा कि खाड़ी युद्ध भारत पर भारी पड़ रहा है। खाड़ी युद्ध विराम की खबर सोमवार की सबसे बड़ी सुर्खी थी। कायदे से इस खबर पर ईरान में जश्न मनाया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान ने युद्ध विराम के लिए डोनाल्ड ट्रंप का शुक्रिया अता करने के बजाय युद्ध विराम की घोषणा को फेक यानि निराधार बता दिया।
आपको बता दूं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि मध्य पूर्व में चल रहे टकराव को पूरी तरह खत्म करने को लेकर बातचीत हुई है। उन्होंने कहा कि पूरी तरह समाधान के मुद्दे पर सकारात्मक बातचीत हुई है। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा ढांचे पर किसी भी तरह के हमलों को पांच दिन के लिए टालेंगे। लेकिन ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बातचीत वाले बयान को नकार दिया है।
युद्धविराम का ऐलान ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट के जरिए किया। ट्रंप ने लिखा, मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दो दिनों में मध्य पूर्व में टकराव के पूरी तरह समाधान को लेकर बहुत अच्छी और सकारात्मक बातचीत हुई है। इस रचनात्मक बातचीत के रुख और माहौल को देखते हुए, जो पूरे सप्ताह जारी रहेंगी, मैंने वॉर डिपार्टमेंट को निर्देश दिया है कि ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा ढांचे पर सभी सैन्य हमलों को पांच दिन के लिए टाल दिया जाए। यह फैसला बैठकों और चर्चाओं की सफलता पर निर्भर करेगा।
उधर ट्रंप युद्ध विराम का ऐलान कर रहे थे इधर भारत की संसद में प्रधानमंत्री भाई नरेन्द्र दामोदर मोदी खाड़ी युद्ध को भारत के लिए कोविड 19 जैसी गंभीर चुनौती बताते हुए राष्ट्र से एक जुटता का आव्हान कर रहे थे। कायदे से उन्हें युद्ध विराम की घोषणा का स्वागत करना चाहिए था, किंतु उन्होने संभवत: सूचना के अभाव में ऐसा नहीं किया। हर युद्ध का पटाक्षेप युद्ध विराम के साथ ही होता है। दुनिया का कोई युद्ध अनंतकाल तक नहीं चला। महाभारत के युद्ध से लेकर खाड़ी युद्ध तक युद्ध विराम ही अंतिम विकल्प होता आया है। ये बात अलग है कि युद्ध विराम की घोषणा कभी तीन दिन में होती है तो कभी 24वें दिन में। युद्ध विराम कभी आठ साल मेझ होता है तो कभी आठ साल में।
दुनिया में युद्ध शुरू करने और युद्ध विराम की घोषणाएं करने में अमेरिका का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। हर सदी में अमेरिका ने ही ये सब किया। अमेरिका कभी 14 साल बाद मैदान छोड़ता है, तो कभी 24 दिन में युद्ध विराम पर आ जाता है। युद्ध शुरू करना फिर उस पर विराम लगाना आसान काम नहीं। इसके लिए कलेजा चाहिए। कलेजा तो युद्ध विराम का मखौल उड़ाने के लिए भी चाहिए और युद्ध की विभीषिका को कोविड जैसी चुनौती मानने के लिए भी कलेजा चाहिए।
खाड़ी युद्ध के परिणाम स्वरूप शेयर बाजार लुढ़का। सोना गिरा, भारत का रुपया गिरा और क्रूड आइल की कीमती बढ़ती-घटती रहीं। खाड़ी युद्ध विराम का एक कारण होता तो गिनाया भी जाए, यहां तो कारण ही कारण ही कारण है। अमेरिका के लिए युद्ध बेहद खर्चीला है। परमाणु हमले का खौफ है। नाटो की बेरुखी है, ताइवान है, खाड़ी में 40 फीसदी इनर्जी अधोसंरचना की बर्बादी है और सबसे बड़ी चुनौती नवंबर में अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव हैं। बहरहाल ईरान युद्ध विराम का स्वागत न करे, किंतु हम युद्ध विराम का स्वागत करते हैं। थेंक्यू कहते हैं, माय डियर ट्रंप को। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था-
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।
अमेरिका के पास गरल की कमी नहीं, इसलिए युद्ध विराम की घोषणा अमेरिका पर फबती है। युद्ध विराम की घोषणा इजराइल ने नहीं की, क्योंकि ईरान ने उसे छठी का दूध याद दिला दिया। ईरान ने युद्ध विराम की घोषणा इसलिए नहीं की क्योंकि उसने हार नहीं मानी। उसने नहीं माना कि ईरान अमेरिका के मुकाबले दंतहीन, विषहीन, विनीत या सरल है। ईश्वर करे कि ये पांच दिवसीय एकतरफा युद्ध विराम स्थाई युद्ध विराम में बदल जाए, क्योंकि युद्ध से केवल और केलल लड़ने वालों का ही नहीं मूक दर्शकों का भी नुकसान होता है। कम से कम भारत के संदर्भ में ये बात प्रमाणित है।


