– राकेश अचल
हम हिन्दुस्तानी अक्सर मंगल की तलाश में जंगल की ओर रुख करते हैं, लेकिन जिस रफ्तार से मप्र जंगलों का सफाया करने में देश में पहले स्थान पर आया है उसे देखते हुए इस बात की आशंका बढ़ गई है कि मप्र के जंगल भविष्य में मंगल मनाने के लिए रहेंगे भी या नहीं?
गत दिनों जंगलों की वैध-अवैध कटाई के मामले में मप्र के नं.वन रहने की खबर सुरखी में छपी तो लेकिन संवेदनशील समाज की ओर से इस खबर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। होती भी कैसे, भारतीय समाज पिछले एक दशक में प्रतिक्रिया हीन और क्रियाहीन बन गया है। कहीं भी, कुछ भी होता रहे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यानि अपने राम मस्ती में, आग लगे बस्ती में।
मप्र भारत में सबसे बड़े वन क्षेत्र का प्रदेश है। मप्र में सरटकारी आंकड़ों के हिसाब से कोई 77 हजार 482 वर्ग किमी का जंगल है। इन जंगलों में अनेक राष्ट्रीय और राज्य अभ्यारण्य भी हैं, किंतु मप्र में जिस गति से जंगलों का सफाया हो रहा है, उसकी वजह से इन जंगलों के अभ्यारण्यों में रहने वाले वन्य प्राणी भी भयभीत हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई से बाघों से लेकर मगरमच्छ समुदाय तक की नींद हराम है, किंतु सरकार बेफिक्र है।
हाल में आई खबर के मुताबिक पिछले 10 वर्ष में मप्र में 38 हजार 533 हैक्टेयर जंगल साफ हो गए। जंगल कभी विकास की भेंट चढ़े, तो कभी लालच की भेंट चढ़ गए। इन दस सालों में 18 महीने छोड़कर भाजपा की सरकार रही। आज भी है, लेकिन जंगलों को बचा नहीं पा रही। बचाना नहीं चाहती, क्योंकि जंगल साफ करने से ही सरकार की, नेताओं और नौकरशाहों की जेबें भरती हैं।
दुर्भाग्य ये है कि जंगल सफाया होता है तो मौजूदा सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकार पर आरोप लगाती है, जबकि कल की सरकार जो आज विपक्ष है आज की सरकार पर आरोप लगाकर फारिग हो जाती है। यानि दोनों ही पक्ष लेकर एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। 1990 से 2000 तक मप्र में कांग्रेस की सरकार थी, तब प्रदेश में 384 हजार हैक्टर जंगल लापता हुए। जबकि 2010 से 2020 में भाजपा की सरकार के रहते 668 हजार हैक्टेयर जंगल गायब हो गए। यानि भाजपा सरकार ने कांग्रेस सरकार से दो गुना ज्यादा जंगल साफ कर दिए गए। यानि भाजपा सरकार ने कांग्रेस सरकार के मुकाबले 284 हजार हैक्टेयर जंगल कटवा दिए।
कहने को हर सरकार अपने आपको पर्यावरण प्रेमी बताती है, लेकिन होती नहीं है। हर सरका जंगलों को ठिकाने लगवाने के अक्षम्य अपराध की दोषी है। जंगल कटते ही मुनाफे के लिए हैं। कभी विकास के नाम पर, कभी खनन के लिए कभी तस्करों के लिए। जगलों का सफाया वे फाइलें कराती हैं जो मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के इशारे पर चलती हैं। जंगल की जमीन का डायवर्सन जंगल नहीं सरकार करती है। जंगलों की अवैध-वैध कटाई से आदिवासी, वन्यप्राणी और पर्यावरण बुरी तरह बर्बाद हो रहा है, किंतु किसी को इन तीनों की चिंता नही। कायदे से सबसे पहले प्रदेश के वनमंत्री को ही नैतिकता के आधार पर हटा देना चाहिए। बाद में उन आईएफएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होना चाहिए जो जंगलों की निगहवान हैं।
मप्र के साथ ही दुनिया में हर पल फुटवाल मैदान के बराबर जंगल गायब हो रहा है। अब तक पूरी दुनिया 37 लाख हैक्टेयर से ज्यादा जंगल निगल चुकी है। दुनिया की छोड़ हमें अपने मुल्क के जंगलों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। मप्र यदि देशी, विदेशी निवेश के मामले में नं.वन रहता तो हमें गर्व होता, किंतु दुर्भाग्य है कि हमें प्रदेश के जंगल सफाए के मामले में नं.वन आए हैं। हमारा सिर शर्म से झुक रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को अपनी कुर्सी के साथ प्रदेश के जंगलों को भी बचाने के लिए भी काम करना चाहिए।


