– राकेश अचल
भारत में इस समय युद्ध उन्माद चरम पर है। भारत अपनी पारंपरिक विदेश नीति से इतर जिस नीति पर चल रहा है उस पर बहस राष्ट्रद्रोह कहा जाता है। भारत को युद्ध की धुंध में ओझल होती चुनौतियों के प्रति आगाह कराना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है। भैंस बीन बजाने पर भी खड़ी पगुराती रहेगी। फिर भी कुछ लोग हैं जो ये काम बिना लाभ-हानि की चिंता किए बिना करते हैं।
भारत इजराइल-अमेरिका के साथ और ईरान के खिलाफ खड़ा है, ये जानते हुए भी कि ये घाटे का सौदा है। युद्ध की धुंध में देश के लिए जो असल चुनौती है उस पर बहस के बजाय अंधभक्तों की फौज और गोदी मीडिया, वाट्सएप विश्वविद्यालय ये समझाने में लगा है कि भारत जो कुछ कर रहा है, केवल वही सही है। अधिकांश जनता रोजी रोटी, मंहगाई की समस्याओं में उलझी है। उसे नहीं पता कि भारत अपनी ऊर्जा और कीमती धातुओं के लिए खतरनाक स्तर तक आयात पर निर्भर है और यही हमारी सबसे बड़ी आर्थिक कमजोरी बनती जा रही है। ईरान जैसे संसाधन समृद्ध क्षेत्रों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच देश के एक अनुभवी और देशभक्त उद्योगपति वेदांता चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर तुरंत नीति नहीं बदली गई तो आम आदमी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
आप शायद न जानते हों लेकिन हकीकत ये है कि भारत 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। रसोई में चूल्हा जलाने के लिए जिस एलपीजी की जरूरत होती है उसका 66 फीसदी हमें आयात करना पड़ता है। वाहन चलाने के लिए काम आने वाली एलएनजी भी 50 फीसदी आयात ही होती है। भारत का सालाना ऑयल-गैस आयात बिल 176 बिलियन डालर का होता है। इतना ही नहीं भारत सालाना 65 बिलियन डालर का सोना आयात आया करता है।
आपको बताना जरूरी है कि कुल आयात का लगभग 30 फीसदी हिस्सा तेल, गैस और सोना का है। तेल से देश का परिवहन सिस्टम चलता है। एलपीजी घरों की रसोई जलाती है। एलएनजी कम उत्सर्जन वाले पब्लिक ट्रांसपोर्ट में काम आता है। ऐसे में कीमतों में तेज उछाल सीधे महंगाई, चालू खाते के घाटे, रुपए की कमजोरी और राजकोषीय दबाव को बढ़ाता है। आपको पता है कि देश इन दिनों ए-1 और ए-2 यानि अंबानी और अडानी के इशारे पर चल रहा है। ऐसे में अनिल अग्रवाल की चेतावनी पर ध्यान कौन देगा? फिर भी लाभ-हानि की चिंता किए बिना अनिल अग्रवाल ने साफ कहा है कि प्राकृतिक संसाधन सेक्टर को तुरंत राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित किया जाए। उनका तर्क है कि भारत को आयात पर निर्भर रहने की बजाय घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े फैसले लेने होंगे। आपको पता है कि पिछले दिनों अनिल अग्रवाल ने अपने इकलौते बेटे को खोया है।
अनिल अग्रवाल कहते हैं कि मौजूदा चुनौती से निबटने के लिए पब्लिक हियरिंग समेत समय लेने वाली प्रक्रियाओं से छूट की तत्काल जरूरत है। पर्यावरण मंजूरी में सेल्फ-सर्टिफिकेशन मॉडल खड़ा किए बिना इन चुनौतियों से नहीं निबटा जा सकता। इसके लिए बाद में ऑडिट, पहले अनुमति भी चाहिए। सरकारी संसाधनों का पूरा उपयोग करने के सा ही सरकारी परिसंपत्तियों में 50 फीसदी तक हिस्सेदारी निजी खिलाड़ियों को देने की जरूरत भी है। कर्मचारियों को शेयर होल्डिंग दी जाए न कि छंटनी की जाए।
अग्रवाल का कहना है कि दुनिया अब पहले से ज्यादा अस्थिर है। आज के भू-राजनीतिक माहौल में स्थायी दोस्त नहीं होते। आत्मनिर्भरता कोई सपना नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक जरूरत है। उनका दावा है कि अगर नियम सरल किए जाएं तो निवेश, उत्पादन और रोजगार तीनों बढ़ेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इस सेक्टर में बड़ी संख्या में युवा महिलाएं आ रही हैं और विदेशों में काम कर रहे भारतीय भी घर वापसी कर सकते हैं।
सवाल अब सरकार के सामने है कि क्या भारत जोखिम उठाकर संसाधन उत्पादन बढ़ाएगा या फिर आयात झटकों से बार-बार अर्थव्यवस्था हिलती रहेगी? भारत को ए वन और ए टू के अलावा ए थ्री यानि अनिल अग्रवाल की बात भी सुनना चाहिए। केवल स्वदेशी, मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया के थोथे नारों से कुछ नहीं होने वाला।


