– राकेश अचल
अजीब दौर है, सरकार हो या अदालत किताबों के पीछे हाथ धोकर पीछे पड़े हैं। सरकार को पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की किताब फोर स्टार डेस्टिनी से तकलीफ है तो सुप्रीम कोर्ट को एनसीईआरटी की कक्षा 8 की उस किताब से तकलीफ है जिसमें अदालतों में भ्रष्टाचार का एक अध्याय शामिल था। दोनों किताबें प्रतिबंध के औपचारिक आदेश के बिना ही गायब कर दी गईं।
दुनिया भर में किताबें लिखने और पढ़ने की सुदीर्घ परंपरा है, लेकिन वे देश जो तानाशाही पर चलते हैं वहां किताबें सरकार की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। भारत में हर सरकार इसी मानसिकता का शिकार बनी।1998 मे सलमान रुशदी की सेनेटिक वर्सेस बैन हुई तो 2014 में वेंडी डोनीगर की दि हिंदू: एन आल्टरनेटिव्ह हिस्ट्री पाठकों तक नहीं पहुंचने दी गई।
इससे पहले 1998 में हमीश मेकडोनाल्ड की किताब दि पोलिएस्टर प्रिंस पर रोक लगा दी गई। 2004 में जेम्स डब्लू लेन की किताब शिवाजी हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया भी प्रतिबंधित रही। आपको याद होगा कि डेन ब्राउन दि विंची कोड को भी को कुछ वक्त के लिए प्रतिबंध का शिकार बनना पड़ा, ये बात 2008 की है। 2010 में जैवियर मेरो की किताब दि रेड साडी, 2009 में जसवंत सिंह की किताब जिन्ना इंडिया पार्टीशन इंडिपेंडेंस पर रोक लगाई गई। अब्रू रेमन की किताब रामा रीटोल्ड को राममजी प्रतिबंध से नहीं बचा सके। विलियम डेलरीमेपल की किताब दि लोटस एंड दि एक्स और जोसफ की किताब प्रतिबंध का शिकार हुई। कभी कानून का दबाब, कभी धर्म तो कभी कुछ और यानि किताबों के सच से पूरी दुनिया डरती है। कही कम तो कहीं ज्यादा।
आजादी के बाद से भारत में करीब 45 किताबें राष्ट्रीय स्तर पर बैन हो चुकी थी। 2025 में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने 25 किताबों पर प्रतिबंध लगाया जिनमें अरुंधति रॉय की आजादी सहित कई किताबें शामिल थीं उत्तर प्रदेश में कुल 5 किताबें हैं जिन्हें उस राज्य सरकार ने बैन किया था। किताबों पर लगने वाले प्रतिबंध अलग-अलग स्तरों पर होते हैं। केन्द्र, राज्य, क्षेत्रीय प्रशासन या कोर्ट आदेशों पर। कुछ प्रतिबंध केवल राज्य या क्षेत्र (जैसे जम्मू-कश्मीर) में लागू होते हैं, पूरे भारत में नहीं। कुछ बैन बाद में कानूनी प्रक्रिया के बाद हटाए या चुनौती दिए गए भी हैं, यानि आज भी बैन है या नहीं वह अलग मामला है।
सवाल ये है कि सरकार हो या अदालत, धर्म हो या समाज किताबों से डरता क्यों हैं? सवाल ये भी है कि क्या कुछ किताबें प्रतिबंध लगवाने के लिए लिखी जाती हैं या सचमुच किताबों में दर्ज तथ्य या किंबदंतियां सरकारों और अदालतों की आत्मा को दहला देती हैं। किताबों पर प्रतिबंध से सच्चाई छुप नहीं सकती। सच्चाई सत्य की वो जलधारा है जो बड़ से बड़े अवरोध को तोड़कर बाहर आ जाती है।
चूंकि मैं एक अदना सा लेखक हूं, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूं कि अपवादों को छोड़कर कोई भी लेखक किसी को आहत करने के लिए नहीं लिखता। लोग सच के उजागर होने से डरकर प्रतिबंध का सहारा लेते हैं। आप ही बताइये कि किसी किताब में जो तथ्य होते हैं उनका खण्डन किया जा सकता है। लेखक को झूठा ठहराया जा सकता है, लेकिन प्रतिबंध तो कोई तरीका नहीं। अब अदालत में भ्रष्टाचार यदि मुद्दा है तो उसे किताब पर प्रतिबंध से बदला या छिपाया नहीं जा सके। सरकार और अदालत को तो सत्यान्वेषण कर लिखने वालों का आभारी होना चाहिए कि उन्होंने आइना दिखाने का काम किया।
भारत में किताबें कम, लेखक ज्यादा बैन होते हैं। अधिकतर प्रतिबंध राज्य स्तर के होते हैं। अदालतें अक्सर सरकार के फैसले पलट देती हैं। सबसे आसान रास्ता कानूनी दबाव डालकर प्रकाशक से किताब हटवाना होता है। लोकतंत्र में किताबों पर प्रतिबंध लगाना अलोकतांत्रिक है। इसका हर स्तर पर पर प्रतिकार होना चाहिए।


