भोपाल, 31 जनवरी। फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र के सहारे मेडिकल की पढ़ाई में प्रवेश लेने के मामले में एसटीएफ कोर्ट भोपाल ने भिण्ड में पदस्थ एक चिकित्सक को दोषी करार देते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। आरोपी लंबे समय तक शासकीय अस्पताल में चिकित्सक के पद पर पदस्थ रहा।
जानकारी के मुताबिक यह मामला व्यापमं द्वारा आयोजित एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा से संबंधित है। जांच में सामने आया कि आरोपी डॉ. सीताराम शर्मा मूल रूप से उत्तर प्रदेश का निवासी था, लेकिन उसने स्वयं को मप्र का निवासी दर्शाने के लिए फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र बनवाया। इसी दस्तावेज के आधार पर उसने राज्य कोटे की मेडिकल सीट पर प्रवेश प्राप्त किया। वर्ष 2009 में व्यापमं द्वारा आयोजित प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) में सफलता के बाद आरोपी ने फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र का उपयोग करते हुए मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। बाद में वह शासकीय स्वास्थ्य सेवा में चयनित होकर चिकित्सक के पद पर कार्यरत रहा। मामले की शिकायत मिलने के बाद वर्ष 2019 में थाना हबीबगंज भोपाल में प्रकरण दर्ज किया गया। पुलिस द्वारा मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई। विवेचना के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपी ने वर्ष 1984 में उप्र माध्यमिक शिक्षा परिषद से हाईस्कूल एवं वर्ष 2001 में इंटर मीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की थी, जिससे उसका उप्र का स्थाई निवासी होना प्रमाणित हुआ। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि इसके बावजूद आरोपी ने कूटरचित दस्तावेज तैयार कर स्वयं को मप्र का मूल निवासी दर्शाया और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल प्रवेश लिया। जांच पूरी होने के बाद फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र निरस्त कर आरोपी के खिलाफ चालान न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्य और गवाहों के माध्यम से आरोपों को प्रमाणित किया। एसटीएफ कोर्ट भोपाल के एडीपीओ आकिल खान के अनुसार 23वें अपर सत्र न्यायाधीश अतुल सक्सेना ने आरोपी को विभिन्न धाराओं में दोष सिद्ध पाते हुए धारा 420 में तीन वर्ष सश्रम कारावास व 500 जुर्माना, धारा 467 में तीन वर्ष सश्रम कारावास व 500 जुर्माना, धारा 468 में तीन वर्ष सश्रम कारावास व 500 जुर्माना, धारा 471 में दो वर्ष सश्रम कारावास व 500 रुपए जुर्माना की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी द्वारा किया गया कृत्य गंभीर प्रकृति का है, क्योंकि इससे योग्य अभ्यर्थियों के अधिकार छिने हैं। शासकीय स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत चिकित्सक द्वारा इस प्रकार का अपराध किया जाना अधिक चिंताजनक है। अदालत ने इसे गंभीर अपराध मानते हुए कहा कि ऐसे मामलों से प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता प्रभावित होती है और वास्तविक व योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन होता है। फिलहाल न्यायालय के आदेश के बाद आरोपी को सजा से संबंधित विधिक प्रक्रिया के तहत जेल भेजे जाने की कार्रवाई की जा रही है।
Saturday, April 11
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