– किसानों का शोषण, मंडी के बाहर अवैध फड़ बने लूट केन्द्र
भिण्ड, 16 दिसम्बर। किसानों की आय दोगुनी करने के चाहे जितने दावे किए जाते हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। दबोह उपमंडी इसका जीता-जागता उदाहरण है।
यहां अन्नदाता अपनी उपज का सही दाम पाने के लिए ठोकरें खाने को मजबूर है। यहां व्यवस्था के नाम पर केवल शोषण और लापरवाही किसानों के हाथ लग रही है। बोरे के वजन और पल्लेदारी में हेराफेरी का आरोप किसान लगा रहे हैं। उन्होंने कहा मंडी में उनकी फसल तो खरीदी जाती है, लेकिन भुगतान और वजन में उन्हें ठगा जा रहा है। बोरे के वजन (बारदाने) और पल्लेदारी (हम्माली) के नाम पर किसानों से प्रति क्विंटल अवैध कटौती की जा रही है। मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन ऊपरी खर्चों और मनमाने नियमों की भेंट चढ़ रहा है।
मंडी सूनी है, लेकिन सड़कों पर सजे अवैध फड़
दबोह गल्ला मंडी कार्यालय के ठीक सामने और आसपास बिना लाइसेंस के गल्ला व्यापारियों की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं। कोंच रोड, भिण्ड-भांडेर रोड, समथर रोड, नदीगांव रोड पर व्यापारियों ने अपने अवैध फड़ जमा रखे हैं। यहां आने वाले किसानों को बातों में उलझाकर मंडी के बाहर ही रोक लिया जाता है और औने-पौने दामों पर उनकी उपज को बिना लाइसेंसधारी व्यापारियों के द्वारा खरीद लिया जाता है। यह पूरा खेल मंडी अधिकारियों की नाक के नीचे और कथित मिलीभगत से चल रहा है।
साहब नदारद, चपरासी संभाल रहा कमान
दबोह उपमंडी कार्यालय राम भरोसे है। यहाँ किसानों की समस्या सुनने वाला जिम्मेदार मौजूद नहीं रहते हैं। आलम यह है कि एक भृत्य के भरोसे पूरा कार्यालय चल रहा है। गल्ला मंडी में फसल की डाक (बोली) लगवाने का काम भी चपरासी ही करता है। अधिकारियों की गैर-मौजूदगी ने व्यापारियों को मनमानी करने की खुली छूट दे रखी है।
नगद नहीं-पर्ची मिल रही, उसमें भी कमीशन खोरी
फसल बेचने के बाद उन्हें तत्काल भुगतान नहीं मिलता। व्यापारियों द्वारा 15 से 30 दिन बाद की भुगतान की पर्ची थमा दी जाती है। जब किसान भुगतान लेने पहुंचते हैं, तो मजबूरी का फायदा उठाकर उसमें भी 2-3 प्रतिशत कमीशन काट लिया जाता है। मंडी प्रशासन किसानों की उपज पर टैक्स तो वसूलता है, लेकिन बदले में उन्हें सुविधाएं देने में हाथ सिकोड़ता है। किसानों के लिए न तो पीने के साफ पानी की व्यवस्था है और न ही धूप से बचने के लिए कोई टीन-शेड या विश्राम गृह। गर्मी, सर्दी हो या बारिश किसानों को अपनी उपज के साथ खुले आसमान के नीचे खड़ा रहना पड़ता है।


