– राकेश अचल
भारत की शीर्ष अदालत ने खतरनाक, रेबीज ग्रस्त और असाध्य रूप से बीमार श्वानों को दया मृत्यु देने का आदेश दिया है। अदालत ने आवारा श्वानों को शेल्टर होम में भेजने के अपने पुराने आदेश को भी वापस लेने से इंकार कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर देश का कोई श्वान प्रतिक्रिया नहीं दे सकता, फिर चाहे वो आवारा श्वान हो या संभ्रांत श्वाना। लगता है कि आज की दुनिया श्वानों के लिए बनी ही नहीं है, क्योंकि सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में श्वान अनावश्यक प्रजाति हैं। एक श्वाना प्रेमी होने के नाते मुझे सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला रुचिकर नहीं लगा। मैं इस फैसले को यदि एक श्वान की हैसियत से देखूं तो मुझे ये आश्वानीय और हिंसक फैसला लगता है। श्वान भी भगवान ने बनाए हैं और वे विलुप्त प्रजाति में शामिल नहीं हुए, इसका अर्थ ये है कि भगवान भी इस धरती को श्वान विहीन नहीं देखना चाहते।
मेरी जानकारी के मुताबिक श्वान इंसान के आदिकालीन मित्र हैं, ठीक वैसे ही जैसे गाय, बैल, घोड़े, तोते आदि। श्वान कलियुग की देन नहीं हैं, ये महाभारत काल में भी थे। युधिष्ठिर के पास भी श्वान था और मुमकिन है कि आज के युधिष्ठिरों के पास भी श्वान हों। श्वानों के बिना एक सुखी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मैंने खुद एक साथ पांच-पांच श्वान पाले हैं। दुनिया में श्वानों की कुल आबादी का हालांकि कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन तमाम अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार दुनिया में लगभग 90 करोड़ से एक अरब श्वान हैं। इनमें पालतू और आवारा दोनों शामिल हैं। एक ताजा शोध के अनुसार दुनिया के लगभग 70-80 प्रतिशत श्वान फ्री-रेंज यानी खुले में रहने वाले या आवारा प्रकृति के हैं।
मुद्दा चूंकि भारत के श्वानों के भविष्य से जुड़ा है, इसलिए सिर्फ भारत की बात करते हैं। भारत में श्वानों की गणना प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि वे वोट नहीं देते। श्वानों की कोई आधिकारिक सूची भी नहीं है, इसलिए कभी उनका एसआईआर भी नहीं हुआ। श्वान घुसपैठिये भी नहीं हैं सो वे कभी राजनीतिक मुद्दा भी नहीं बनें। भारत में श्वानों की आबादी का हर आंकड़ा विवादास्पद है। फिर भी भारत में 1.5 करोड़ से लेकर 6 करोड़ तक आवारा श्वानों का अनुमान है। वैसे हाल के कुछ अनुमानों में केवल आवारा श्वानों की संख्या लगभग 1.53 करोड़ (15.3 मिलियन) बताई गई है।
भारत में सबसे ज्यादा आवारा श्वान उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में बताए जाते हैं। भारत में कदाचित ही ऐसा कोई राज्य होगा जहां श्वान न पाए जाते हों। हमारे लोक में श्वानों को घोड़े की तरह वफादार और बकौल हमारी दादी के बिना झोली का फकीर कहा जाता है। ये श्वान अपने मालिक को कभी ये धमकी इसीलिए नहीं दे पाते कि मैं झोली उठाकर चला जाऊंगा।
भारत चूंकि अहिंसा को परम धर्म मानता है सो यहां श्वान मारने की कोई राष्ट्रीय या प्रांतीय सरकारी नीति नहीं है। भारत में श्वानों को भी सम्मान से जीने का हक है, लेकिन इंसानों की तरह ही श्वानों की एक बड़ी आबादी होमलैस है। इन्हें दो जून का भोजन मुफ्त में देने की भी कोई नीति नहीं है। इसी वजह से देश के श्वानों का मामला देश की शशीर्ष अदालत तक पहुंचा। दुनिया के कई देशों में सरकारें या स्थानीय प्रशासन आवारा श्वानों को मारने की नीति अपनाते रहे हैं, खासकर रेबीज, हमलों या बड़े आयोजनों के समय। चीन यात्रा के दौरान मुझे बताया गया था कि चीन में रेबीज फैलने या बड़े सरकारी आयोजनों से पहले कई शहरों में बड़े पैमाने पर आवारा श्वानों को मार दिया जाता है।
पड़ौसी पाकिस्तान के करांची और अन्य शहरों में जहरीला खाना देकर हजारों आवारा श्वानों को मारने के अभियान चले। बांग्लादेश में भी पहले बड़े पैमाने पर मारने की नीति थी, बाद में नसबंदी और टीकाकरण मॉडल की ओर झुकाव बढ़ा। मोरक्को में भी आवारा श्वानों की गोली मारकर हत्या की जाती है। टर्की में आवारा श्वानों को लेकर राजनीतिक विवाद चलता रहा, कुछ नगर पालिकाओं पर मारने के आरोप लगे। रोमानिया में वर्ष 2013 के बाद आक्रामक श्वानों के मामलों के बाद इथूनेशिया कानून लागू हुए। श्रीलंका में भी रेबीज पीड़ित श्वान मार दिए जाते हैं।
भारत में कानूनन बड़े पैमाने पर आवारा श्वानों को मारना अनुमति प्राप्त नहीं है। भारत की नीति मुख्यत: नसबंदी, एंटी-रेबीज टीकाकरण और पुनर्वास पर आधारित है। अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद देश में कितने श्वान मारे जाते हैं, कितनों को आश्रय मिलता है?


