– राकेश अचल
मप्र उच्च न्यायलय की इंदौर पीठ ने लंदन के संग्रहालय में रखी भोजशाला की वाग्देवी की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाने के निर्देश दिए सफेद संगमरमर से बनी लगभग चार फुट ऊंची और 250 किलो वजनी यह ऐतिहासिक प्रतिमा 11वीं सदी की मानी जाती है। प्रतिमा पर संस्कृत में शिलालेख अंकित हैं जो इसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाते हैं। यह प्राचीन प्रतिमा फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है।
खबर अच्छी है लेकिन यहां आकर वाग्देवी की प्रतिमा सनातन की राजनीति करने वालों का एक नया औजार बन जाएगी। उस पर रोली-चंदन लगेगा। महा आरती होगी और फिर लंबी-लंबी लंबी तकरीरें होंगी। वाग्देवी की वापसी का श्रेय दोनों हाथों से लूटा जाएगा। हाईकोर्ट के निर्देश पर यदि भारत सरकार आधिकारिक रूप से इस प्रतिमा को वापस लाने का अनुरोध करती है, तो इसे जल्द ही भारत वापस लाया जा सकता है और यह अपने मूल स्थान पर पुन: स्थापित हो सकती है। ऐसी धारणा है कि 11वीं सदी में राजा भोज ने इस प्रतिमा को भोजशाला में स्थापित किया था। करीब 4 फुट ऊंची और लगभग 250 किलो वजनी यह मूर्ति बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर मानी जाती है। 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान भोजशाला का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया था। बाद में 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान खुदाई में यह प्रतिमा मलबे से मिली, जिसे 1880 में एक अंग्रेज अधिकारी इंग्लैंड ले गया। तब से यह मूर्ति लंदन में ही संरक्षित है।
मध्य प्रदेश के धार शहर में स्थित एक ऐतिहासिक परिसर भोजशाला को लेकर बहुत पुराना विवाद है,भोजशाला को हिंदू पक्ष मा वाग्देवी (सरस्वती) का प्राचीन मन्दिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। माना जाता है कि 11वीं शताब्दी में परमार राजा राजा भोज ने यहां संस्कृत शिक्षा और विद्या के केन्द्र की स्थापना की थी। इसलिए इसे भोजशाला कहा गया। हिंदू संगठनों का दावा है कि यहां देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित थी और यह एक भव्य मन्दिर था। मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह सदियों पुरानी मस्जिद है, जहां नमाज अदा होती रही है।
अंग्रेजों के समय से जारी ये विवाद ब्रिटिश काल में भी तनाव का केन्द्र रहा। बाद में प्रशासन ने व्यवस्था बनाई कि मंगलवार को हिंदू पूजा कर सकते हैं। शुक्रवार को मुस्लिम नमाज पढ़ सकते हैं। लेकिन वसंत पंचमी यदि शुक्रवार को पड़ जाए तो विवाद अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि दोनों पक्ष उस दिन अधिकार चाहते हैं। ये विवाद हल होकर भी हल नहीं हो पाया, क्योंकि मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खण्डपीठ ने 15 मई 2026 को जो फैसला सुनाया है वो मुस्लिम पक्ष और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने संकेत दिया है कि वे इस फैसले को भारत का सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।
अदालत ने कहा कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप मां वाग्देवी/ सरस्वती मन्दिर और संस्कृत अध्ययन केन्द्र का है। अदालत ने 2003 के उस एएसाई का वो आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें शुक्रवार को नमाज और मंगलवार को पूजा की व्यवस्था थी। अदालत ने कहा कि परिसर का प्रबंधन और संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और केन्द्र सरकार देखे। मुस्लिम पक्ष के लिए धार जिले में वैकल्पिक जमीन देने का सुझाव भी दिया गया, ताकि अलग मस्जिद बनाई जा सके। यह फैसला न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की खण्डपीठ ने दिया। यदि इस पीठ में कोई और भी होता तो शायद ये फैसला न हो पाता।
अब सवाल ये है कि क्या यहां खण्डित मूर्ति की पूजा होगी या फिर नहीं। इसके विकास के लिए मप्र सरकार भोजशाला के विकास के लिए धनवर्षा कर अपना उल्लू सीधा करेगी या नहीं क्योंकि अब भोजशाला पुरातत्व संरक्षित स्मारक है, न कि पूजा घर। वैसे भी भोजशाला की मुक्ति का जश्न हिंदुत्व की सनातन की जीत का जश्न बनाया जा रहा है। ऐसे मुद्दे न हों तो भाजपा की राजनीति का ही भट्टा ही बैठ जाए। क्योंकि भाजपा की दिलचस्पी वाग्देवी में नहीं बल्कि विवाद में है। भाजपा यदि वाग्देवी को पूजती तो देश में नीट घोटाला नही होता।


