– राकेश अचल
खाड़ी युद्ध के 72 वें दिन भारत के फकीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ये मान लिया कि इस युद्ध ने भारत की कमर तोड़ दी है, इसीलिए देश वासियों को ईंधन का संयम से इस्तेमाल करना चाहिए और संकट से निबटने के लिए एक साल तक सोना नहीं खरीदना चाहिए।
पिछले 72 दिन में हमने और हमारे जैसे तमाम लेखकों ने जब-जब खाड़ी युद्ध की वजह से देश की जर्जर होती अर्थव्यवस्था पर कलम चलाई तो हमारा उपहास किया गया। हमने विदेशी मुद्रा संकट और डालर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत के बारे में लिखा तो भक्त मण्डल ने हमें देशद्रोही करार दे दिया। अब यही सब बातें फराकदिली से मोदी जी स्वीकार कर रहें तो भगवा ब्रिगेड अभिभूत है। हमारी श्रीमती जी अपनी माहाना बचत योजना के पैसे से आज ही दो-तीन ग्राम सोना खरीदने जा रही थीं किंतु जैसे ही उन्होंने तेलंगाना में तेल संकट पर मोदी जी की अपील पढ़ी सोना खरीदने की योजना मुल्तबी कर दी। राष्ट्र हित में हर नागरिक इतना तो त्याग कर ही सकता है।
मोदी जी ने कोरोना काल की तरह तमाम अनुशासन अपनाने की सलाह दी। कम पेट्रोल-डीजल खर्च करो, घर में बैठकर काम करो, मेट्रो से आओ-जाओ, कार पूल करो, कम तेल खाओ, सोना मत खरीदो आदि-आदि। हमारे यहां इस तरह की हिदायतों को ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहि ते नर न घनेरे’ कहा जाता है। फकीर पंत प्रधान की ये सलाहें नेता नगरी पर लागू नहीं होतीं। वे चुनाव जीतने के लिए चाहे जितनी रैलियां, रोड शो कर सकते हैं। सरकारी विमानों का इस्तेमाल स्कूटर की तरह कर सकते हैं। उनके लिए कार-पूल, वर्क फ्रॉम होम और मेट्रो रेल के इस्तेमाल की बाध्यता नहीं है। वे चाहे जितना तेल खा सकते हैं, लगा सकते हैं, लगवा सकते हैं, नेता चाहे जितना सोना खरीद सकते हैं, कोई रोक नहीं।
दरअसल देश को संकट से उबारने का सारा नैतिक दायित्व उस गरीब भारतीय का है, जो अब मतदान भी नहीं कर सकता। गरीब आदमी सबसे बड़ा देश भक्त होता है। वह ईंधन बचाने के लिए घर बैठ सकता है, कम तेल खा सकता है, सोना खरीदने से अपने आपको रोक सकता है किंतु जो लोकसेवक हैं, जो विधायक, मंत्री, सांसद और नौकरशाह हैं, वे ये त्याग नहीं कर सकते। मजबूर जो हैं। हमें याद है कि इस देश ने नाटे कद के एक प्रधानमंत्री के आव्हान पर देश को अन्न संकट का सामना करने के लिए एक वक्त के भोजन और साप्ताहिक उपवास पर अमल किया था। लेकिन वो प्रधानमंत्री दिन में पांच वक्त की नमाज की तरह पांच वक्त कपड़े नहीं बदलता था। सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कम से कम करता था, घर वालों को तो बिल्कूल नहीं करने देता था। उनका नाम था लाल बहादुर शास्त्री।
हमारे प्रधानमंत्री न लालबहादुर हैं और न शास्त्री, फिर भी उन्होंने पहली बार स्वीकार किया कि हमारे पास न तेल के कुएं हैं, न सोने की खानें, न उर्वरक है, न तेल और दालें हैं। हमें इन सबके लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। ये सब पाने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। हम न तेल के मामले में आत्म निर्भर हैं और न खाद के मामले में। फिर भी हम महान हैं, क्योंकि विश्वगुरु हैं। प्रधानमंत्री की इन तमाम सलाहियतों का एक ही लब्बोलुआब है कि देश में किसी भी दिन पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेल और खाद के दाम बढ़ाए जा सकते हैं। कभी भी विदेश यात्राओं पर अंकुश लगाया जा सकता है, यानि आपका तेल निकाला जा सकता है। तिलों से तेल निकालना सरकार अच्छी तरह जानती है। सरकार की रगों में सिंदूर ही नहीं व्यापार भी बहता है। ईश्वर देश की देशवासियों को हर आने वाले संकट से महफूज रखें।


