– राकेश अचल
देश की राजनीति में नए अध्याय जब-तब जुड़ते हैं और जब जुड़ते हैं तो लोगों को यकीन नहीं होता। देश की आजादी के बाद बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति में पूरे 8 दशक बाद एक नया अध्याय जुड़ा है। राजनीति के ये नए अध्याय अपने अक्षर किस रंग में उकेरेंगे, ये कोई नहीं जानता।
सबसे पहले बंगाल की बात करते हैं। बंगाल की संस्कृति और राजनीति की विशिष्ट पहचान रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर कल 8 मई 2026 तक बंगाल की राजनीति में कभी समाजवादी और धर्मनिरपेक्षता के ध्वज लहराए, तो कभी ढाई दशक तक वामपंथ का लाल रंग चढ़ा रहा। बंगाल ने डेढ़ दशक तक जमीन से जुड़ी तृणमूल की भी राजनीति देखी जो थी तो कांग्रेस का क्लोन लेकिन कभी दक्षिणपंथ की गोद में बैठी तो कभी उसकी दुश्मन बन गई।
आज का बंगाल हिन्दूवादी, दक्षिण पंथियों के हाथों में है। अब बंगाल में न तिरंगा है और न लाल झंडा। अब यहां भगवा ध्वज फहरा रहा है। बंगाल में हिन्दुत्व की जीत वामपंथ की पराजय है या समाजवादी धर्मनिरपेक्षता की? इस पर शोध होना बाकी है। लेकिन बंगाली राजनीति बदली है। बंगाल के बाद राजनीति का नया अध्याय लिखा गया है उस तमिलनाडु में जो पिछले 8 दशक से द्रविड़ राजनीति का गढ़ था। तमिलनाडु में अब तक बारी-बारी से डीएमके और एआईडीएमके ने राज किया, लेकिन हाल के विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु की जनता ने द्रविड़ राजनीति की चादर अप्रत्याशित रूप से उतार फेंकी है। तमिलनाडु के इतिहास में पहली बार कोई गैर द्रविड़ दल थलपति बना है। नाम है थलापति विजय।
थलापति विजय अभिनेता हैं, इसके अलावा उनमें, उनकी पार्टी टीवीके और द्रविड़ लों के बीच कोई समानता नहीं है। थलापति तमिलनाडु के हैं, लेकिन तमिल नहीं एक ईसाई हैं। उनकी जीत में ईसाइयत की कोई भूमिका है या नहीं इस पर भी शोध होगा, क्योंकि किसी ने ये कल्पना नहीं की थी कि द्रविड़ राजनीति अचानक से इतिहास बन जाएगी।
बंगाल जीतने के बाद हिंदुत्ववादी शक्तियों ने तमिलनाडु में थलापति विजय का विजय रथ पांच दिन तक रोका, किंतु अंत में हार मान ली। दक्षिण में अभी केरलम एक ऐसा अकेला राज्य है जिसका राजनीतिक चरित्र नहीं बदला है। कर्नाटक में उलट फेर होता आया है। आंध्र और तेलंगाना की राजनीति भी बंगाल और तमिलनाडु जैसी नहीं रही। पूरब में असम के अलावा छोटे राज्यों की राजनीति में भी क्षेत्रीय दलों की भूमिका रेखांकित करन योग्य नहीं बची। अब देखना ये है कि भारतीय गणराज में आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों के लिए कितनि जगह बचती है? पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण की राजनीति में तालमेल बैठेगा भी या नहीं ये अभी भविष्य के गर्त में है और अनुत्तरित है।
अंत में मैं एक बार फिर तमिलनाडु की बात करूंगा, क्योंकि यहां 121 के आंकड़े के समर्थन ने यह साबित कर दिया कि जनादेश और संख्या बल के सामने सबसे ताकतवर राजनीतिक रणनीतियां भी टिक नहीं पातीं। जिस थलापति विजय को कुछ लोग केवल अभिनेता मान रहे थे, वही अब सत्ता के दरवाजे तक पहुंच चुके हैं। लोकतंत्र की सेहत के लिए सहकार की जरूरत है न कि अदावत की तलवार की।


