– राकेश अचल
मौजूदा सदी में जनादेश फुटबॉल की तरह है। कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। क्योंकि जनादेश प्रचण्ड हो या खण्ड-खण्ड उसका सम्मान करने के लिए कोई तैयार नहीं है। बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के जनादेश इसका ताजा उदाहरण है।
बंगाल में भले ही भाजपा को मिला जनादेश मशीनरी और मशीनगनों की वजह से मिला हो, लेकिन निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस जनादेश को मानने के लिए राजी नहीं हैं। वे इस जनादेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। जबकि उन्हें पता है कि शीर्ष अदालत से उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ेगा। तमिलनाडु में नवगठित टीवीके को जनता ने प्रचण्ड बहुमत दिया है, लेकिन राज्यपाल टीवीके के सेनापति विजय को सरकार बनाने का न्यौता नहीं दे रहे। वे टीवीके से पूरे 118 विधायक मांग रहे हैं। बेचारे मजबूर हैं। जैसा निर्देश दिल्ली से मिलेगा वैसा वै करेंगे। हकीकत ये है कि दोनों राज्यों में मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध जनादेश मिला है।
तमिलनाडु में राजहठ है तो बंगाल में त्रिया हठ। अब राजहठ हो, त्रियाहठ हो या आसानी से शांत नहीं होता। बंगाल गंवा बैठीं ममता बनर्जी को सम्मान सहित हथियाये गए बंगाल को भाजपा को सौंप देना चाहिए था। लेकिन वे सही फैसला नहीं कर सकीं। उन्हें बरखास्तगी झेलना पड़ी। वे इससे बच सकती थीं, उन्हें कोलकाता छोड़ बंगाल में आभार यात्रा पर निकल जाना चाहिए था। जनता के बीच जाकर अपनी बात रखना चाहिए थी।
तमिलनाडु में भाजपा लोकप्रिय सरकार बनने में सबसे बड़ी बाधा है, जबकि उसके पास वहां कोई जन समर्थन नहीं है। लेकिन राज्यपाल है, जिसके जरिए भाजपा जनादेश की अवमानना कर रही है। भाजपा ने चुपके से टीवीके के भीतर सेंध लगा दी है। अब तलापति असमंजस में हैं। उन्हे द्रविड़ राजनीती के खिलाफ जनादेश मिला है, इसलिए वे डीएमके और एआईएडीएमके से समर्थन ले नहीं सकते। तमिलनाडु में कांग्रेस को लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए मजबूरी में टीवीके को समर्थन देना पड़ रहा है वो भी डीएमके के साथ अपना दशकों पुराना गठबंधन तोड़ कर। मुझे लगता है कि डीएमके भी चाहती है कि भाजपा का खेल खराब करने के लिए कांग्रेस टीवीके का साथ दे। डीएमके ने पहले ही छह माह तक टीवीके सरकार को परेशान न करने की बात कही है।
मुझे उम्मीद है कि तमिलनाडु को अस्थिर करने में भाजपा को कामयाबी नहीं मिलेगी। भाजपा तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लगाने का दुस्साहस नहीं कर सकती। क्योंकि ऐसा किया गया तो तमिल अस्मिता का मुद्दा तो उठेगा ही, साथ ही तलापति की सेना भी सड़कों पर आकर भाजपा की नाक में दम कर सकती है।
कुल मिलाकर दक्षिण और पूरब में जनादेश से फुटबॉल खेलने का शर्मनाक खेला हो रहा है। बेहतर हो कि सत्ता परिवर्तन को एक सहज लोकतांत्रिक प्रक्रिया बने रहने दिया जाए। भारत में अभी तक सत्ता का हस्तांतरण सहजता से ही होता था, किंतु भाजपा ने इसे दुरूह बना दिया है। अब भाजपा जनादेश न मिलने पर खरीद-फरोख्त, तोड़फोड़, भयादोहन का इस्तेमाल करने लगी है। भाजपा ने तमिलनाडु में लोकप्रियता के शिखर पर खड़े थलापति को भी नहीं छोड़ा। उसके खिलाफ ताजा मामला दर्ज कर अपनी कुटिलता का निर्लज्ज मुजाहिरा किया है।


