– राकेश अचल
चुनाव बाद की हिंसा में झुलस रहे बंगाल में शांति स्थापना के लिए इंतजाम करने के बजाय केन्द्र सरकार ने वंदेमातरम को जन-गण-मन के समकक्ष लाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है। वंदे मातरम को अब जन-गण-मन की तरह ही सम्मान देना होगा, वरना 3 साल की जेल और ऊपर से जुर्माना लगाया जा सकता है।
सरकार का ये फैसला प्रशासनिक है या राजनीतिक, ये मैं नहीं बल्कि आप तय करें, क्योंकि ये निर्णय है ही दूरगामी परिणाम देने वाला। आप इस फैसले का समर्थन करें तो राष्ट्रभक्त और न करें तो देशद्रोही घोषित किए जा सकते हैं। सरकार का ध्येय इस फैसले के माध्यम से एक खास कौम को परेशान करना है जो अपनी धार्मिक आस्था की वजह से वंदे मातरम का गान नहीं करना चाहती। वंदेमातरम और जन-गण-मन में कौन श्रेष्ठ है, कौन नहीं? ये विवाद कभी नहीं रहा। आज की सरकार को जन-गण-मन से ज्यादा वंदेमातरम ज्यादा बेहतर लगता है बस। यदि 1911 में कांग्रेस के अधिवेशन में जन-गण-मन के स्थान पर वंदेमातरम का गान हुआ होता और उसी को राष्ट्रगान बनाया जाता तो शायद आज की सरकार को वंदेमातरम के लिए मेहनत नहीं करना पड़ती।
मुझे जितना प्रिय जन-गण-मन है उतना ही वंदेमातरम भी, किंतु जो सम्मान मैं जन-गण-मन को देता हूं उतना या उसके बराबर किसी और रचना को नहीं दे सकता। ये विवाद ही अनावश्यक है कि जन-गण-मन के समकक्ष कोई दूसरी रचना रखी जाए, वो भी सिर्फ इसलिए कि उससे एक खास समुदाय को राष्ट्र विरोधी कहने में सुविधा होती है। इसी देश में जबसे भाजपा सत्ता में आई है तब से एक नारा हवा में गूंजता है कि ‘यदि भारत में रहना होगा, जय श्रीराम कहना होगाÓ। अब यदि भारत में रहना होगा तो वंदेमातरम गाना होगा की मांग भी उठाई जाएगी। अन्यथा वंदेमातरम का इस्तेमाल जन-गण-मन की तरह करने का ख्याल किसी के मन में आता ही क्यों?
दुनिया में न्यूजीलेंड और डेनमार्क जैसे चुनिंदा देशों में एक के बजाय दो राष्ट्रीय गान हैं, लेकिन दोनों ही देशों में इनका इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए नहीं किया जाता। वंदेमातरम निश्चित ही मन को झंकृत करने वाली रचना है, लेकिन उसका दायरा जन-गण-मन जैसा विस्तृत नहीं है। इसलिए उसे जबरन राष्ट्र गान के समकक्ष रखना एक राजहठ से ज्यादा कुछ नहीं। देश जन-गण-मन गाए या वंदेमातरम गाए, लेकिन इससे देश की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वंदेमातरम गाने से हर पेट को दो जून रोटी की गारंटी नहीं मिलने वाली। मताधिकार सुनिश्चित नहीं होने वाला। यदि ऐसा हो सकता तो कितना अच्छा होता? जन-गण-मन के एकाधिकार को समाप्त करने की मंशा ही ठीक नहीं। यदि कांग्रेस से इतनी ही शत्रुता है तो जन-गण-मन को आम भारतीय के मन से निकालने का फैसला होना चाहिए, ताकि न रहे बांस, न बजे बांसुरी।
जलते बंगाल को वंदेमातरम को अतिरिक्त सम्मान या जन-गण-मन के समकक्ष खड़ा करने से राहत नहीं मिलने वाली। जरूरत इस बात की है कि बंगाल को जलने से बचाओ। बंगाल की राजनीति हिंसा के लिए अभिशप्त है। यहां जो भी दल सत्ता में आता है हिंसा का सहारा लेता ही है। कांग्रेस, वामपंथी और तृणमूल ने भी हिंसा को प्रोत्साहित किया और अब सत्ता सम्हालने जा रही भाजपा भी यही सब कर ही है। बंगाल जो आज हिंसा की चपेट में है उसी ने देश को पहले वंदेमातरम दिया और उसी ने जन-गण-मन। देश कृतज्ञ है बंगाल के प्रति। लेकिन बंगाल आज जिस चौराहे पर खड़ा है वहां अंधेरा ही अंधेरा है।


