– राकेश अचल
इधर विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए और उधर बंगाल धधक उठा। सीधा सवाल है कि अब बंगाल को कौन जला रहा है? कौन विजयोन्माद में बुलडोजर और दियासलाई लेकर बाजारों में दिखाई दे रहा है? सवाल ये भी है कि क्या चुनाव हारी टीएमसी के सिर पर ही हिंसा क नया ठीकरा फोड़ा जाएगा?
मैंने कल ही तो लिखा था कि बंगाल में दीदी के बाद दादावाद आया है और 24 घण्टे में ही मेरी आशंका सही नजर आने लगी, पश्चिम बंगाल के राजधानी कोलकाता के मशहूर हॉग मार्केट यानी न्यू मार्केट के पास मंगलवार की रात भीड़ ने बुलडोजर लाकर तृणमूल कांग्रेस के न्यू मार्केट यूनियन दफ्तर को पूरी तरह तोड़ दिया गया। यह सब भाजपा की विजय जुलूस के दौरान पुलिस की मौजूदगी में हुआ। सांसद डेरेक ओÓब्रायन की तरफ से आरोप लगाए गए हैं कि बड़ी संख्या में लोग बुलडोजर के साथ पहुंचे और निर्माण को गिराया गया। उनके मुताबिक, मौके पर सीएपीएफ के जवान भी मौजूद थे। वीडियो में भी बुलडोजर से ढांचे को गिराते हुए देखा जा सकता है। पश्चिम बंगाल का चुनावी अतीत पहले भी हिंसा और टकराव से जुड़ा रहा है। चुनाव परिणाम के बाद कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें और तनाव देखने को मिलता रहा है। इस घटना ने एक बार फिर माहौल को संवेदनशील बना दिया है।
बंगाल में जब तक नई सरकार नहीं बन जाती तब तक यहां केंचुआ शासन रहेगा। इसीलिए निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के प्रमुखों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि चुनाव के बाद किसी भी प्रकार की हिंसा या उसे भड़काने की कोशिश को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाए। आयोग ने हिंसक घटनाओं के प्रति शून्य सहनशीलता यानी जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने को कहा है। यानी पश्चिम बंगाल में हिंसा भड़काने और तोड़फोड़ करने वालों को तुरंत गिरफ्तार किया जाएगा। बंगाल में केन्द्र के निर्देश पर अभी भी अर्धसैन्य बलों की 2600 कंपनियों के 2 लाख से ज्यादा जवान तैनात हैं। फिर भी जीतने के बाद भाजपा कार्यकर्ता सड़क पर कैसे निकल आया। जाहिर है कि भाजपा टीएमसी की हार से खुश नहीं है। भाजपा टीएमसी को नेस्तनाबूत करना चाहती है। भाजप कार्यकर्ता लेनिन की मूर्तियां तोड़ रहे हैं और पुलिस दूर खड़ी तमाशा देख रही है। ये सब विकृत मानसिकता का प्रमाण है।
बंगाल हारने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा न देने की बचकानी घोषणा की है। वे इस्तीफा दें या न भी दें। इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। ममता बनर्जी त्रियाहठ के बजाय उन्हें थोक में चुनाव याचिकाएं दायर कर न्याय मांगें। बेहतर हो कि अगले आम चुनाव की तैयारी करें। वे ऐसा कर सकती हैं। यदि बंगाल को जबरन हथियाया गया है तो जनता को साथ लें। वैसे मेरा अनुभव है कि हारी हुई पार्टी किसी अदालत से न्याय हासिल नहीं कर सकती। उसे जनता के बीच ही जाना पड़ता है और जब पाला भाजपा से पड़ा है तो बात करेला और नीम चढ़ा वाली स्थिति बन जाती है। भाजपा का ट्रेक रिकार्ड रहा है कि यदि एक बार सत्ता उसके हाथ आ गई तो भगवान भी उसे सत्ताच्युत नहीं कर सकते।
बंगाल की जनता के अच्छे दिन तो तब आएंगे जब विधिवत सरकार की कमान सम्हालने के बाद सूबे में भाजपा की बुलडोजर संहिता और बुलडोजर न्याय शुरु होगा। भाजपा अपने विरोधियों से सीधे मुंह बात नहीं करती, उसे संवाद के लिए भी बुलडोजर की जरूरत पड़ती है। भाजपा की बुलडोजर संहिता देश के 20 सूबों में तो लागू थी ही, अब बंगाल 21वां राज्य होगा। बंगाल की जनता के साथ मेरी संवेदनाएं और सहानुभूति है। राजा राम बंगालियों की रक्षा करें।


