– राकेश अचल
देश में एक निशान, एक विधान के बाद एक चुनाव, एक प्रभाव, एकराय संसद, चुनाव आयोग यहां तक कि अब एक न्याय का सिद्धांत फलता-फूलता नजर आ रहा है। लगता है कुछ दिनों में सब संस्थाएं भी एकनाथ हो जाएंगी।
मैं यह बात शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में टीएमसी की उस याचिका को खारिज किए जाने के बाद कह रहा हूं, जिसमें ममता की पार्टी ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसमें मतगणना पर्यवेक्षकों के तौर पर सिर्फ केन्द्रीय कर्मचारी या सार्वजनिक उपक्रमों का स्टाफ रखने की बात कही गई है। ममता की टीएमसी ने इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने भी ममता की आपत्ति खारिज कर दी थी।
ममता को कोई सुनना ही नहीं चाहता। न संसद, न प्रधानमंत्री, न चुनाव आयोग और न अब शीर्ष अदालत। शीर्ष अदालत ने बिना कोई निर्देश पारित किए सुनवाई समाप्त कर दी। अदालत ने कहा कि इस मामले में किसी आदेश की जरूरत नहीं है। न्यायालय ने केवल निर्वाचन आयोग की इस बात को दर्ज किया कि मतगणना कर्मचारियों की नियुक्ति संबंधी परिपत्र का अक्षरश: पालन किया जाएगा। यह तब हुआ जब तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि अब वह केवल यह मांग कर रही है कि परिपत्र के अनुसार प्रत्येक मतगणना केन्द्र पर कम से कम एक व्यक्ति राज्य सरकार का कर्मचारी हो। बंगाल में 4 मई को मतगणना है।
शीर्ष अदालत का फैसला शिरोधार्य होता है। ममता के लिए ही नहीं बल्कि हर उस भारतीय के लिए जो संविधान में, भारतीय न्याय व्यवस्था में आस्था रखता है। ये बात और है कि तमाम फैसले जनता की आस्था और विश्वास दोनों को समूल हिला देते हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों से किसी भी प्रकार की निष्ठा की अपेक्षा नहीं की जा सकती और इस बात पर जोर दिया कि वे आधिकारिक कर्तव्य के तहत कार्य करते हैं। सरकारी कर्मचारियों की आस्था को लेकर शीर्ष अदालत की धारणा बदली नहीं जा सकती, बदली भी नहीं जाना चाहिए, किंतु जब हकीकत और अफसाना अलग-अलग हो तो पुनर्विचार जरूरी हो जाता है। बंगाल में पर्यवेक्षक बनकर गए यूपी के आईपीएस अजय पाल उर्फ सिंहम की निष्ठा किसके प्रति थी? ये जरूर देखा जाना चाहिए था।
तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि पार्टी की चिंता राज्य सरकार के नामित व्यक्तियों की अनुपस्थिति को लेकर है। पीठ ने रुख में आए इस बदलाव पर ध्यान दिया और टिप्पणी की कि याचिका में पहले परिपत्र को चुनौती दी गई थी, लेकिन अब इसे लागू करने की मांग की जा रही है। सिब्बल ने सीसीटीवी फुटेज के संरक्षण पर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि इसे नष्ट कर दिया जाता है। हालांकि, चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि वह परिपत्र का ठीक से पालन कर रहा है और कहा कि व्यवस्थाएं संतुलन सुनिश्चित करती हैं, जहां मतगणना पर्यवेक्षक केन्द्र सरकार से है, वहीं मतगणना एजेंट राज्य सरकार से हैं।
भारत में शीर्ष अदालत से तर्क ही किए जा सकते हैं अब यदि शीर्ष अदालत केंचुआ को दूध का धुला मान ही बैठी हो तो कोई जिरह बेकार है। केंचुआ की गतिविधियों को शीर्ष अदालत बिहार में एसआईआर के समय से देख रही है। लेकिन केंचुआ के सारे खून माफ कर दिए गए। अब मैं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की तरह शीर्ष अदालत के सामने तर्क, कुतर्क करने से रहा। जब वे शीर्ष अदालत को मुतमईन नहीं कर पाए तो कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नियमों को मनमाने ढंग से लागू नहीं किया जा सकता है और आरोप लगाया कि भारतीय चुनाव आयोग अनियमितताओं की आशंकाओं का हवाला देकर राज्य को अनुचित रूप से निशाना बना रहा है।
सिब्बल ने पीठ के समक्ष चार मुद्दे उठाए। जिनमें बैठकों में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि बैठकें तो होती हैं, लेकिन हमें उनकी जानकारी नहीं दी जाती। उन्होंने आगे तर्क दिया कि केन्द्र सरकार द्वारा नामित एक व्यक्ति पहले से ही माइक्रो पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद है और इस तरह की एक और नियुक्ति की आवश्यकता पर सवाल उठाया। संबंधित परिपत्र का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि इसमें राज्य सरकार द्वारा नामित व्यक्ति की नियुक्ति अनिवार्य है, लेकिन अधिकारी इसका पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे अपनी मर्जी से काम करते हैं।
बहरहाल जब देश में सरकार और लोकतंत्र के दूसरे पायों के चश्मे का नंबर एक हो जाए तो न किसी को न्याय के लिए याचिकाएं लगाना चाहिए और न बहस करना चाहिए। शीर्ष अदालत शीर्ष है। हम सब उसका तहे दिल से सम्मान करते हैं और करते रहेंगे। अब अगर आप सरकार को शीर्षासन कराना चाहते हैं तो या तो किसी मन्दिर में अर्जी लगाइए या फिर जनता की अदालत में। हमने बचपन से पढा और सुना है कि जनता ही जनार्दन होती है। हालांकि जब लाखों जनार्दनों से मताधिकार छीन लिया जाए तो जनता का जनार्दन होना भी एक तरह से संदिग्ध हो जाता है।


