– राकेश अचल
भारत की संसद में ओंधे मुंह गिरना कोई पहली घटना नहीं है, पहली घटना ये है कि संसद में ओंधे मुंह गिरकर भी कोई सरकार खुशी के मारे फूली नहीं समा रही। आप कह सकते हैं कि सरकार ओंधे मुंह गिरकर भी खुशी से फूल कर कुप्पा हो रही है। जाहिर है सरकार की योजना ही ओंधे मुंह गिरकर सहानुभूति बटोरने की थी।
महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक सरकार पारित कराने के लिए लेकर आई ही नहीं थी। उसे तो केवल नारी वंदन को सियासी नारे में तब्दील करना था, सो ऐसा करने में सरकार सफल रही और विपक्ष इसे अपनी कामयाबी समझ रहा है। बहरहाल अच्छी बात ये हुई कि जादूगर नाकामी के बाद भी नाखुश नहीं है। ओंधे मुंह कोई जान-बूझकर गिरे तो इसे काइयांपन कहते हैं। क्योंकि ओंधे मुंह यूं ही नहीं गिरा जाता। ओंधे मुंह गिरने के कुछ नियम हैं, शर्तें हैं, कायदे हैं, कानून हैं। ओंधे मुंह गिरना बहुत आसान काम नहीं है। ओंधे मुंह गिरने से नाक चोटिल होती है, चश्मे टूटते हैं और फिटनेस के साथ ही गिरने वाले की चाल, चरित्र और चेहरे पर भी सवाल उठने लगते हैं।
मैंने अपने शहर के पं. अटल बिहारी बाजपेई को संसद में ओंधे मुंह गिरते देखा है। वे तो 1 वोट की कमी से ओंधे मुंह गिरे थे, लेकिन नाक वाले थे सो झोला उठाकर चले गए थे। यहां तो जादूगर नरेन्द्र चार-पांच दर्जन वोटों की कमी से ओंधे मुंह गिरे, लेकिन माथे पर कोई शिकन नहीं। क्योंकि भैया जी को ओंधे मुंह गिरने का खासा तजुर्बा जो है। मैंने शुरु में ही कहा कि ओंधे मुंह गिरना कोई अजूबा नहीं है। कांग्रेसी हों या न हों, सब ओंधे मुंह गिरते रहे है। मनमोहन सिंह गिरे, देवगौड़ा गिरे। वाजपेयी जी एक बार नहीं दो नहीं तीन बार गिरे। लेकिन भाजपा के जादूगर आनंद की तरह कोई नहीं गिरा। जादूगर इधर ओंधे मुंह गिरे उधर पलक झपकते ही नारी वंदन का नारा लेकर चुनाव प्रचार के लिए निकल लिए।
भारत को ऐसे बहादुर ओंधे मुंह गिरने वाले पंत प्रधान पर गर्व करना चाहिए। मिर्जा अजीम बेग अजीम बहुत पहले ही ओंधे मुंह गिरने वालों की हौसला आफजाई के लिए लिख गए थे कि गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले। मतलब भाजपा के जादूगर शहसवार हैं और ऐसे घोड़े पर सवार हैं जो हवा से बातें करता है या फिर मन की बात।
बहरहाल मैं ओंधे मुंह गिरने वालों के प्रति सहानुभूति रखता हूं, इसलिए भाजपा के जादूगर मोशा के प्रति भी मेरी हमदर्दी है। अब कमबख्त हमदर्दी भी हमदर्द से बनी है। इसे सनातनी शहसवार तस्लीम करेंगे भी या नहीं? हमदर्दी जताते वक्त में सियासत को बीच में नहीं लाता। मैंने देवगौड़ा, वाजपेयी और मनमोहन सिंह के प्रति भी हमदर्दी का इजहार किया था, सो मोदी जी के प्रति भी मेरी हमदर्दी को अन्यथा न लिया जाए। हमदर्दी तो हमदर्दी है. उसकी कोई पार्टी नहीं होती। दुनिया को हमदर्दी का सबक हर ज्ञानी ने सिखाया है। बिना झोली के फकीर महात्मा गांधी तो हर दिन प्रार्थना सभा में वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे! गाते ही थे। मेरी दादी अक्सर कहती थीं कि जा के पांव न फटी बिमाई, सो का जाने पीर पराई? अब साहब अपुन तो वैष्णव जन भी हैं और अपने पैरों में बिमाइयां भी खूब फटी हैं, इसलिए अपने राम तो पराई पीर को भी जानते हैं और हमदर्दी जताना भी जानते हैं।
सरकार के ओंधे मुंह गिरने से भक्त मण्डली भी दुखी नहीं है। क्योंकि उनके देवता को ही ओंधे मुंह गिरने से कोई फर्क नहीं पड़ा। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे सरकार और सरकारी पार्टी को कोई मुंह मांगी मुराद मिल गई हो। मुमकिन है कि मोदीजी ने इसके लिए कोई जप-तप किया हो। वैसे भी मोदीजी हैं जहां हर चीज मुमकिन है, ये मेरा जुमला नहीं है। ये भक्त मण्डली का जुमला है। संसद में हुए इस हादसे से होंसे-फूले नहीं समा रहे, विपक्ष को भी मैं आगाह करना चाहता हूं कि वे किसी मुगालते में न रहें। ओंधे मुंह गिरने वाले लोग बाद में और ज्यादा घातक हो जाते हैं। इसलिए विपक्ष सावधान रहे। लोकतंत्र पर से संकट के बादल हटे नहीं हैं, केवल विचलित हुए हैं।


