– राकेश अचल –
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सम्मान के बाद अब महामहिम राष्ट्रपति का सम्मान राजनीति की वेदी पर होम होने लगा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खलनायिका साबित करने के लिए अब राष्ट्रपति को औजार बनाया जा रहा है। ममता पर आरोप है कि उन्होने बंगाल दौरे पर गई राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू की अगवानी न कर उनका घोर अपमान किया है।
महामहिम हों, लोकसभा अध्यक्ष हों या देश के मुख्य न्यायाधीश हों अक्सर राजनीतिक विद्वेष के शिकार बनते रहते हैं। आपको याद होगा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई के साथ महाराष्ट्र की भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने जो किया था वैसा ही कुछ-कुछ महामहिम राष्ट्रपति महोदया के साथ बंगाल में हुआ। अलिखित राजकीय शिष्टाचार कहता है कि देश में अलग-अलग क्षेत्रों के प्रथम हैं उनकी अगवानी राज्यों के मुख्यमंत्री को करना चाहिए। लेकिन ये बाध्यकारी नहीं है। अनेक अवसरों पर मुख्यमंत्री अपने स्थान पर मंत्रिमंडल के किसी दूसरे सदस्य को अगवानी के लिए भेजता है।
दुर्भाग्य की बात है कि भाजपा ने माननीयों के सम्मान को भी सियासी औजार बना लिया है। अभी जिन लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया है उनकी निष्पक्षता के कसीदे प्रधानमंत्री खुद पढ़ रहे थे। लेकिन जब एक मुख्य न्यायाधीश का महाराष्ट्र में कथित तौर पर आपमान हुआ तो सरकार या सरकारी पार्टी का पेट नहीं दुखा था। मैंने पहली बार देखा है कि सरकार और सरकारी पार्टी राष्ट्रपति की जाति, और पद का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है। मप्र विधानसभा चुनाव के ठीक पहले राष्ट्रपति को मप्र के आदिवासी अंचलों में सिर्फ इसलिए भेजा गया ताकि आदिवासी भाजपा को आदिवासियों का हितैषी समझे। गलती भाजपा की भी नहीं है, गलती महामहिम की है। उन्हें सरकार के इशारे पर अपने कार्यक्रम तय नहीं करना चाहिए। माना कि राष्ट्रपति रबर की मोहर होता है किंतु इतना भी नहीं कि अपनी मर्जी से सांस भी न ले सके।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ममता बनर्जी ने कहा कि वह राष्ट्रपति का सम्मान करती हैं, लेकिन अगर कोई 50 बार भी आए तो हर कार्यक्रम में शामिल होना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि वह इस समय धरने पर बैठी हैं और जिस कार्यक्रम का जिक्र किया जा रहा है, उसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। अब या तो ममता झूठी है या राष्ट्रपति सचिवालय।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति पर हमला करते हुए कहा कि उन्हें यह कहते हुए शर्म आ रही है कि राष्ट्रपति को भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए भेजा गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति भाजपा की नीतियों के जाल में फंस गई हैं। ममता ने कहा कि भाजपा की प्राथमिकता राजनीति है, जबकि उनकी प्राथमिकता जनता है। उन्होंने राष्ट्रपति से सवाल करते हुए कहा कि जब मणिपुर में आदिवासियों पर अत्याचार हो रहे थे तब राष्ट्रपति क्यों चुप थीं? ममता बनर्जी ने यह भी पूछा कि राजस्थान और महाराष्ट्र में आदिवासियों के साथ कथित अत्याचार के मामलों में राष्ट्रपति ने सवाल क्यों नहीं उठाए? ममता बनर्जी ने वही बात कही है जो मैं मप्र के संदर्भ में पहले कह चुका हूं। ममता ने राष्ट्रपति से कहा कि चुनाव से पहले उनके साथ राजनीति न की जाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने किसी कार्यक्रम को रोकने की कोशिश नहीं की थी और न ही उस आयोजन से उनका कोई संबंध था। मुख्यमंत्री ने दोहराया कि उनकी सरकार की प्राथमिकता राज्य के लोगों की भलाई है। उन्होंने कहा कि भाजपा राजनीति को प्राथमिकता देती है।
आपको बता दूं कि 9वें अंतर्राष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने पश्चिम बंगाल पहुंचीं थीं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने छोटे कार्यक्रम स्थल को लेकर नाराजगी जताई थी। साथ ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस बात पर भी दुख व्यक्त किया था कि निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें स्वागत करने के लिए मुख्यमंत्री या राज्य सरकार का कोई मंत्री मौजूद नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्हें इससे व्यक्तिगत रूप से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन देश के राष्ट्रपति के लिए तय किए गए प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यदि जानबूझकर राष्ट्रपति का अपमान किया है तो ये निंदनीय है। लेकिन ये बात भी गले नहीं उतरती कि महामहिम अपने अपमान का जिक्र खुद करें। वे इस अपमान का घूंट पी लेतीं तो शायद उनका सम्मान और बढ़ता लेकिन जिस तरह से उन्होंने प्रतिक्रिया दी है उससे जाहिर है कि महामहिम भी राजनीति कर रहीं हैं। वैसे गोस्वामी तुलसीदास लिख गए हैं कि नारि न मोहे, नारि के रूपा, पन्नगारि यह रीत अनूपा।


