– राकेश अचल
हम सनातनियों की वसुधैव कुटुंबकम और आतंकवाद की परिभाषा देशकाल और परिस्थिति के हिसाब से बदलती जा रही है। इन दोनों मुद्दों पर भारत 2014 के पहले जैसे सोचता था, अमल करता था, वैसा आज नहीं है। आज हम ताकतवर के साथ हैं, हमलावर के साथ हैं। हमारी सत्य, अहिंसा के मूल्य तिरोहित हो गए हैं।
फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इजराइल, ईरान युद्ध में अमेरिका बेगानी शादी का अब्दुल्लाह नहीं है बल्कि इजराइल का ही चचा है। युद्ध के दूसरे ही दिन ईरान के राष्ट्रपिता खामनेई की नृशंस हत्या के बाद भारत सरकार की चुप्पी
ने भारत की विदेश नीति को फिर सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। अजीब बात ये कि भारत के प्रधानमंत्री ने खामनेई की मौत पर शोक, संवेदना जताना तो दूर उल्टे हत्यारे पक्ष से फोन पर बात कर प्रत्युत्तर में ईरान द्वारा किए गए हमलों की निंदा कर डाली।
सवाल ये है कि भारत सरकार ने ये जानबूझ कर किया? ऐसा करना जरूरी था या फिर ये सब मजबूरी में अपनाया गया रुख है? भारत ने ईरान को एकदम से ऐसा देश मान लिया है जिससे उसका कभी कोई रिश्ता था ही नहीं। भारत के लिए वो ईरान अचानक आतंकवादी मुल्क बन गया, जिसने सदियों तक भारत के साथ वैश्विक मंचों पर न सिर्फ कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, बल्कि तेल के कारोबार में भी भारत को हमेशा कंसेशन दिए।
मजे की बात ये है कि भारत का स्मृति शून्य मीडिया भी भारत सरकार के ईरान विरोधी रुख को न्यायसंगत बताने के लिए ईरान के खिलाफ रोज नई किंवदंतियां गढ़ रहा है। इतिहास झूठ बोलने और शतुरमुर्गी मुद्राएं अपनाने से बल नहीं जाता। भारत के ईरान विरोध के पीछे वही डर है जो इजराइल के मन में है। जो अमेरिका के मन में है। ईरान का इस्लामी मुल्क होना एक ऐसा बिन्दु है जिस पर इजराइल, अमेरिका और भारत एक ही तरह से सोचते हैं। भारत की इस विषय में न कोई अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है, न कूटनीत। इस समय भारत साफ तौर पर पिछलग्गू नजर आ रहा है।
मजहब के नाम पर यदि विदेश नीति का निर्धारण होने लगा है तो कुछ कहने की जरुरत ही नहीं। राष्ट्रभक्ति के नाम पर आम भारतीयों को भी अपना मुंह बंद कर लेना चाहिए। भारत पर ईरान अहसान फरामोशी का आरोप लगाए तो लगाता रहे। भारत ने ईरान के साथ चाबहार परियोजना से हाथ किसके दबाब में खींचा ये दुनियां जानती है। भारत के इस दब्बूपन का फायदा किसे हो रहा है, ये भी सबको पता है। आगे इस रुख का क्या नतीजा होगा ये भी सब जानते हैं।
हम आम भारतीय अपनी विदेश नीति का निर्धारित नहीं कर सकते, यही वजह है कि भारत में जिस आबादी ने खामेनेई की हत्या के विरोध में प्रदर्शन किए उस आबादी से अंधभक्त ईरान जाने के लिए कह रहे हैं। अंधभक्तों की भी वही मनोदशा है जो भारत के प्रधानमंत्री की। वे भी देश की विदेश नीति भारतीय मूल्यों, संस्कारों के आधार पर तय नहीं कर पा रहे हैं। कभी-कभी लगता है कि जैसे हमारी सरकार कहीं और से गवर्न हो रही है।
किसी भी देश की विदेश नीति के अपने मूल्य होते हैं। विदेश नीति नस्ल, जाति और मजहब की बिना पर नहीं बनतीं। यदि ईरान अचानक भारत के लिए खलनायक हो गया है तो तोड़ लीजिये ईरान से राजनयिक संबंध। बुला लीजिये सभी भारतीयों को स्वदेश। भगा दीजिए तमाम ईरानियों को भारत से। लेकिन ये हो नहीं सकता। क्योंकि दुनिया के तमाम इस्लामिक देशों में असंख्य भारतीय रोजी रोटी कमा रहे हैं।
आतंकवाद के मुद्दे पर भी भारत की नई कसौटी संदिग्ध है। एक तरफ भारत की नजर में ईरान अचानक आतंकी मुल्क हो गया है और घोषित आतंकी मुल्क अफगानिस्तान से भारत नए रिश्ते कायम कर रहा है। अभी भी वक्त है विश्व गुरु के लिए कि वे किसी डर या दबाव में भारत की विदेश नीति की बलि न दें। फाइलें तो खुलती, बंद होती रहती हैं। देश सबसे ऊपर होता है। ये गांधी-नेहरू का बनाया देश है, किसी भागवत या मोदी का बनाया देश नहीं। बुरा न मानो होली है। कोई रंग से होली खेल रहा है तो कोई खून से। तय आपको करना है कि आप किस तरह के हुरियारों के साथ हैं।


