– राकेश अचल
ग्रहण चाहे चंद्रमा को लगे, चाहे सूर्य को, उनकी मुक्ति का समय तय है। जैसे 3 मार्च को लगने वाला ग्रहण एक खण्डग्रास चंद्र ग्रहण है। भारतीय समयानुसार चन्द्र ग्रहण 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर शुरू हो जाएगा और शाम को 6 बजकर 46 मिनट पर इसका समापन हो जाएगा। साल के इस पहले चंद्र ग्रहण की कुल अवधि 3 घण्टे 27 मिनट तक रहेगी। लेकिन 27 फरवरी से विशश्व शांति को लगे ग्रहण के मोचन का कुछ पता नहीं है।
सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण की पौराणिक कहानियां आप सभी ने सुनी और पढ़ी होंगी। आप ग्रहण के खलनायकों को भी पहचानते हैं, लेकिन विश्व शांति को लगे ग्रहण के राहु-केतु को लेकर अभी कोई कहानी लिखी नहीं गई है। आज के दौर के राहु-केतु अमर तो नही हैं, लेकिन वे इतना उत्पात मचाये हुए हैं कि दुनिया का जीना हराम है।
पहले आपको चन्द्र ग्रहण की कहानी सुनाते हैं। प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच बार-बार युद्ध होते थे। असुरों की शक्ति बढ़ती जा रही थी, इसलिए देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। विष्णु जी ने सलाह दी कि समुद्र का मंथन करके अमृत प्राप्त किया जाए, जो अमरत्व प्रदान करता है। देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर मंथन किया गया। मंथन से कई दिव्य वस्तुएं निकलीं- कामधेनु, उच्छै:श्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, लक्ष्मी जी और अंत में अमृत कलश। अमृत के लिए विवाद होने लगा। असुर अमृत नहीं छोड़ना चाहते थे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का सुंदर स्त्री रूप धारण किया और अमृत का वितरण शुरू किया। मोहिनी ने चतुराई से देवताओं को पहले अमृत पिलाना शुरू किया।
एक असुर स्वरभानु ने देवताओं का रूप धारण करके चुपके से देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और अमृत पी लिया। उसने दो घूंट अमृत पी ही लिए थे कि सूर्य और चंद्रमा ने उसकी चालाकी देख ली। उन्होंने तुरंत भगवान विष्णु को इशारा किया। क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन क्योंकि उसने अमृत पी लिया था, इसलिए वह मरा नहीं। उसका सिर अलग होकर राहु बन गया और धड़ अलग होकर केतु बन गया। दोनों ही अमर हो गए और ये दोनों ही कहते है आज भी चंद्रमा और सूर्य के पीछे पड़े रहते हैं।
आज की विश्वशांति के लिए जो राहु केतु हैं उनका नाम अमेरिका और इजराइल है। ये दोनों नहीं चाहते कि कोई मुल्क इनकी तरह ताकतवर हो या उसके पास वो परमाणु शक्ति हो जो इनके पास है। इसीलिए ये अलग अलग मुल्कों पर अलग अलग तरीको से समझौते करने के लिए दबाव डालते हैं और जब बात नहीं बनती तो ये जंग शुरू कर देते हैं। कलिकाल के राहु-केतु ने स्वरभानु की तरह अमृतपान किया या नहीं, ये तो कोई नहीं जानता लेकिन इतना सबको पता है कि ये दोनों विश्वशांति के दुश्मन हैं। दोनों जंग के बहाने तलाशते रहते हैं। दोनों श्रेष्ठता ग्रंथि के शिकार हैं। दोनों हथियारों के सौदागर हैं। दोनों के लिए बहुत जरूरी है कि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में जंग होती रहे, अमन खतरे में पड़ा रहे, ताकि दोनों का धंधा आबाद रहे। कलियुग के ये राहु-केतु दुनियां को बर्बाद करने पर आमादा हैं।
विश्व शांति के इन दोनों दुश्मनों ने इस समय ईरान को निशाना बनाया हुआ है। दोनों मिलकर ईरान पर ताबड़तोड़ बारूद बरसा रहे हैं, कोई दया-धर्म नहीं है इनका। बच्चे मरें या बूढ़े, इन्हे हत्या से काम। इजराइल के हाथ तो गाजा में 80 हजार से ज्यादा फ्लिस्तीनियों के खून से रंगे हुए हैं। लेकिन बहुत से लैग हैं जिन्हें इन खून आलूदा हाथों में हाथ डालकर घूमने में मजा आता है। इसलिए ऐसे लोग भी विश्व शांति के दुश्मनों में शुमार हैं।
रमजान के महीने में एक मजहब विशेष के मुल्क पर हमला घोर पाप की श्रेणी में आता है। जो लोग युद्ध के पक्षधर हैं या मूक दर्शक हैं, उन्हें आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी। हम प्रार्थना करते हैं कि विश्वशांति युद्ध के ग्रहण से यथाशीघ्र मुक्त हो।


