– राकेश अचल
सरकार जब अपनी पर उतर आए तो वो कुछ भी कर सकती है, यहां तक कि उसे संसद चलाने के लिए विपक्ष की दरकार भी नहीं है। सरकार ने तय कर लिया है कि विपक्ष के सामने रत्तीभर नहीं झुका जाएगा, भले ही संसद को आगे हांके से ही क्यों न चलाना पड़े। संसदीय भाषा में हांके को गिलोटिन कहते हैं।
आपको बता दें कि सरकार और विपक्ष के बीच तनाव के चलते लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक की नौबत आ चुकी है। विपक्ष के 118 सांसदों ने इस पर दस्तखत किए हैं, इस प्रस्ताव पर 9 मार्च को बहस और मतदान के लिए प्रस्तुत होगा। होली अवकाश के बाद बजट सत्र का दूसरा भाग 9 मार्च से 2 अप्रैल तक चलेगा, जिसमें कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए जाएंगे। केन्द्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी दलों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर विपक्षी दल सत्र के पहले भाग के दौरान किए गए विरोध प्रदर्शनों को जारी रखते हैं तो अंतत: ये उनके लिए हानिकारक होगा। विपक्ष के लिए सरकार की ओर से धमकी भी है और आर-पार की लड़ाई लड़ने का संकेत भी।
प्रस्ताव पर बहस कम हंगामा ज्यादा होने की संभावना है। लगता है कि सरकार हंगामा कराना चाहती है ताकि उसे गिलोटिन (समूह मतदान) का इस्तेमाल करने का बहाना मिल सके। इस प्रक्रिया में विपक्ष को हासिये पर डालने की व्यवस्था है। जो विपक्ष के लिए नुकसानदेह माना जाता है। दर असल गिलोटिन हर सरकार के लिए सुदर्शन चक्र जैसा हथियार है। इसका इस्तेमाल कांग्रेस ने भी अतीत में किया लेकिन भाजपा सरकार इसका बार-बार इस्तेमाल कर गिलोटिन का दुरुपयोग कर रही है। गूगोलोजी के मुताबिक गिलोटिन फ्रांसीसी क्रांति के समय सिर काटने वाला एक यंत्र था। इसी यंत्र से प्रेरित होकर भारतीय संसद में इसे अपनाया गया। गिलोटिन का मतलब है बजट सत्र के दौरान अनुदान की मांगों और संबंधित वित्तीय व्यवसाय को तेजी से पास करना। जब समय कम होता है या हंगामा/ गतिरोध होता है या सभी मंत्रालयों पर विस्तृत चर्चा नहीं हो पाती, तो लोकसभा स्पीकर गिलोटिन लागू करते हैं। इसके बाद बची हुई सभी अनुदान मांगों को एक साथ वोटिंग में डाल दिया जाता है, बिना और बहस के।
यह प्रक्रिया लोकसभा में बजट सत्र के अंत में काफी सामान्य है। मुझे याद है कि 2004-05 में तत्कालीन यूपीए सरकार के समय सभी अनुदान मांगें बिना चर्चा के पास कराई गई थीं। 2013-14 में भी यूपीए सरकार के समय फिर सभी अनुदान मांगें गिलोटिन के जरिए बिना चर्चा के पास करा दी गई थीं। कांग्रेस से प्रेरित होकर 2018-19 में मोदी सरकार के समय सभी अनुदान मांगें बिना किसी चर्चा के पास हुई और फिर गिलोटिन का इस्तेमाल आम बात हो गई. वर्ष 2020-21 में भी मोदी सरकार ने दिल्ली दंगों के कारण संसद में गतिरोध के चलते गिलोटिन का सहारा लिया और सभी वित्तीय विधेयक/ अनुदान बिना चर्चा पास कराए।
संभवत: 2022-23 मार्च 2023 में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने गिलोटिन लागू किया, सभी मंत्रालयों की अनुदान मांगें और एप्रोप्रियेशन विधेयक बिना चर्चा वॉइस वोट से पास करा दिया। पिछले साल 2024-25 मे भी लोकसभा स्पीकर ने गिलोटिन का इस्तेमाल किया और विपक्ष के हंगामे के बीच बजट पास कराया गया।मेरे विचार से गिलोटिन एक हिंसक प्रावधान है। यह प्रक्रिया हर बजट सत्र में किसी न किसी हद तक इस्तेमाल होती है, क्योंकि सभी 100 मंत्रालयों पर विस्तार से चर्चा संभव नहीं हो पाती, लेकिन जब पूरी या ज्यादातर मांगें बिना चर्चा पास होती हैं, तो इसे खास तौर पर गिलोटिन कहकर हाइलाइट किया जाता है। यह सरकार का वैध संसदीय अधिकार है, पर अक्सर विपक्ष इसे चर्चा दबाने का तरीका बताकर विरोध करता है। सरकार की योजना लोकसभा में पांच मंत्रालयों में अनुदान की मांगों पर और राज्यसभा में हम पांच अन्य मंत्रालयों के कामकाज पर चर्चा कराने की है। राज्यसभा में अनुदान की मांगों पर नहीं बल्कि मंत्रालयों पर चर्चा होगी।
आपको बता दें कि सरकार की ओर से लोकसभा के 8 सांसदों का निलंबन वापस लेने की वजह से विपक्ष भी आक्रामक है। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने माना कि बजट सत्र का दूसरा भाग रोचक होगा। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष सदन को कार्य करने नहीं देता है तो हम उसे पद से हटा देंगे। ये उनके लिए करारा झटका होगा। उन्होंने कहा कि हम कुछ महत्वपूर्ण विधेयक लाएंगे, जिनमें एक बेहद अहम विधेयक भी शामिल है। हम अभी यह खुलासा नहीं करेंगे कि वह विधेयक क्या है? मुमकिन है ये विधेयक एक देश, एक चुनाव को लेकर हो?
उल्लेखनीय है कि सत्र के पहले भाग के दौरान लोकसभा में 2 फरवरी से व्यवधान उत्पन्न हुआ, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के अंशों को उद्धृत करने की अनुमति नहीं दी गई, जिसमें 2020 के भारत-चीन संघर्ष का जिक्र था। गत 4 फरवरी को विपक्ष के विरोध प्रदर्शन के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का जवाब नहीं दे पाए और एक अभूतपूर्व कदम के तहत 5 फरवरी को प्रधानमंत्री के पारंपरिक भाषण के बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। अध्यक्ष ने राष्ट्रपति के संबोधन के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा और विपक्षी सदस्यों के नारेबाजी के बीच ध्वनि मत से इसे पारित कर दिया गया।


