– राकेश अचल
मध्यप्रदेश कहिए, मद्यप्रदेश कहिए या मृत्यु प्रदेश कहिए कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि इस सूबे के तमाम जनप्रतिनिधि, विधायक, सांसद, मंत्री बौरा गए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इसका अपवाद नहीं हैं। मप्र की इस दुर्दशा की वजह मप्र के सभी राजनीतिक दलों में सर्वमान्य और धमक वाले नेताओं का घनघोर अकाल है।
मप्र में दो दशक से ज्यादा समय से भाजपा की सरकार जरूर है, लेकिन पार्टी के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसके भृकुटि विलास से समय ठहर जाए। मप्र के पूर्वी भाग के नेता की पश्चिम के लोग नहीं सुनते और दक्षिण के नेता की बात उत्तर के लोग नहीं सुनते। सबकी अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग है। कांग्रेस में भी यही स्थिति है। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को पार्टी में कोई सेठ ही नहीं रहा। वे वीडी शर्मा की तो छोड़िए स्व. प्रभात झा या नंदकुमार चौहान की भी बराबरी नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा आपके सामने है। प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय प्रेस को घंटा दिखा रहे हैं, तो पांच साल पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने आपको उन 12 जिलों का स्वंयभू झण्डा वरदार घोषित कर दिया है जो आजादी से पहले तत्कालीन ग्वालियर रियासत का हिस्सा थे।
मप्र के नेताओं के बौराने के अनेक उदाहरण हैं। विजय शाह का नाम आप भूले नहीं होंगे। वे मंत्री हैं और आपरेशन सिंदूर का अंग रही कर्नल सोफिया को आतंकवादियों की बहन कह चुके हैं। उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश के किसानों को गुड़ की खेती करने का सुझाव दे चुके हैं। कांग्रेस में मुकेश नायक पर बौरा भूत चढ़ा है। उन्होंने मप्र की महिलाओं को लेकर जो टिप्पणी की उसको लेकर माफी भी न देना पड़े। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह आरएसएस की संगठनात्मक क्षमता की तारीफ कर पार्टी में खलनायक बन चुके हैं, वे अपने रौब में रहते है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती तो साध्वी हैं। वे हर मुख्यमंत्री के रास्ते में व्यवधान खड़े करने को लेकर खुश रहती हैं। उनके धर्म भाई भाजपा विधायक प्रीतम सिंह लोधी अपनी ही प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं।
विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर को पार्टी ने खुद नख-दंत विहीन कर दिया है। उन्होंने हालांकि अपने आपको बौराने से बचाने की बहुत कोशिश की किंतु उनके सब्र का प्याला भी कई बार छलक चुका है। तोमर क्षेत्र में पार्टी हाईकमान द्वारा ज्योतिरादित्य सिंधिया को वजन दिए जाने से क्षुब्ध हैं लेकिन दिल के छालें दिखाएं किसे? केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी अपनी पहली जैसी हैसियत खो चुके हैं। मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव चौहान साहब को भाव नहीं दे रहे हैं, इसलिए शिवराज भी मोहनराज की जड़ों में मठा डालने का काम कर रहे हैं। पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा हों या पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के भांजे अनूप मिश्रा, सब मोहनराज से नाखुश हैं। नाखुश नेता ही बाद में बौरा जाते हैं, फिर चाहे वो कैलाश विजयवर्गीय हों या सिंधिया या चौहान। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर दांए हाथ समझे जाने वाले लोग भी अब दाएं-बाएं छिपने लगे हैं।
जनता के बीच काम करने वाले नेताओं की कुंठा रह-रहकर झरती है। जैसे कैलाश विजयवर्गीय ने पहले घण्टा कहा, फिर बोले यदि संघ के पदाधिकारी न होते तो शहर में आग लगा देते। अर्थात इन कुंठित नेताओं के पास आग लगाने की क्षमत है। ये किसी भी नौकरशाह पर चड्डी गांठ सकते हैं। लव्वोलुआब ये है कि मन की कुंठा सब कुछ गुड़ गोबर कर रही है, इधर भी और उधर भी। रब ही जाने कि इब क्या होगा!


