– विकास की लाइट गायब, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ीं नगर की हाईमास्क लाइटें
भिण्ड, 29 दिसम्बर। दबोह नगर के मुख्य चौराहों को रोशनी से सराबोर करने के लिए नगर परिषद द्वारा लाखों रुपये खर्च कर लगवाई गई हाईमास्क लाइटें अब सफेद हाथी साबित हो रही हैं। आलम यह है कि कई चौराह से ये कीमती लाइटें गायब हो चुकी हैं और रात होते ही नगर अंधेरे की आगोश में समा जाता है। क्योंकि नगर में लगभग 3 से 4 जगह हाई मास्क लाइटे लगवाई गई थी। जिससे नगर जगमग होता था, परन्तु आज स्तिथि यह है की नगर के हृदय स्थल मुख्य मार्ग कोंच रोड तिराहे पर लगे हाई मास्क लैटके पोल से लाईटे गायब हो गई और बकाया खम्बो की लाइटें काफी समय से बन्द है, सूत्रों की माने तो इनके रखरखाव पर नगर परिषद हर साल हजारों का बजट खर्च करती है।
भ्रष्टाचार या लापरवाही, खम्बों से गायब हुई लाइटें
नगर परिषद ने जनता की सुविधा और सुरक्षा को देखते हुए नगर के प्रमुख चौराहों पर हाईमास्क लाइटें स्थापित करवाई थीं। लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत है। कई खंभों पर सिर्फ लोहे का ढांचा खड़ा है, जबकि उनमें लगी लाखों की लाइटें नदारद हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इन लाइटों के रख-रखाव के नाम पर भारी बजट ठिकाने लगाया गया,लेकिन हकीकत में जमीन पर अंधेरा पसरा है।
अंधेरे के कारण बढ़ रहा हादसों और चोरी का डर, आखिर जिम्मेदार कौन
मुख्य चौराहों पर अंधेरा होने के कारण राहगीरों और वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों के सक्रिय होने और चोरी जैसी वारदातों का खतरा भी बढ़ गया है। व्यापारियों का कहना है कि शाम ढलते ही बाजारों में सन्नाटा पसर जाता है, जिससे उनके व्यापार पर भी असर पड़ रहा है।
जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
हैरानी की बात यह है कि नगर की इस विकराल समस्या पर नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। न तो गायब हुई लाइटों की सुध ली जा रही है और न ही खराब पड़ी लाइटों को सुधारा जा रहा है। जनता के टैक्स के पैसे की इस कदर बर्बादी को लेकर नगरवासियों में भारी आक्रोश व्याप्त है। बड़ा सवाल यह है कि नगर परिषद जनता से विकास के नाम पर भारी भरकम टैक्स वसूलती है, लेकिन जब सुविधाओं की बारी आती है,तो बजट का अभाव बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। लाखों की लागत से लगी लाइटें गायब होना और बन्द होना सीधे तौर पर सार्वजनिक संपत्ति की बर्बादी और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। देखा जाए तो नगर परिषद के रिकार्ड में शायद ये लाइटें आज भी जल रही होंगी, लेकिन धरातल पर स्तिथि कुछ और ही है, यह विरोधाभास परिषद की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। हर साल मेंटेनेंस (रखरखाव) के नाम पर लाखों का बिल पास होता है, फिर भी खंभे शो-पीस बने खड़े हैं। आखिर वह पैसा किसकी जेब में जा रहा है? बिना किसी जवाबदेही के चल रही यह व्यवस्था अब जनता के धैर्य की परीक्षा ले रही है। नगर परिषद की यह निष्क्रियता न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि उन नागरिकों के साथ विश्वासघात भी है जिन्होंने नगर की बेहतरी के लिए इन्हें चुना था। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषियों पर गाज नहीं गिरेगी, तब तक दबोह के मुख्य चौराहे ऐसे ही अंधेरे और भ्रष्टाचार की गवाह बने रहेंगे।


