भिण्ड, 06 अक्टूबर। उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास भिण्ड केके पाण्डेय ने समस्त विकास खण्ड वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी को निर्देशित कर कहा है कि जिले में धान फसल का रकबा निरंतर विस्तृत होता जा रहा है, किंतु धान की पराली जलाने से भूमि की उर्वरता एवं पर्यावरण पर गंभीर विपरीत प्रभाव जैसे मृदा उर्वरकता में कमी, पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि, पशुओं एवं मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, मृदा में लाभकारी जीवाणुओं का नष्ट होना आदि पड़ते हैं। इन दुष्प्रभावों को रोकने तथा पराली न जलाने के विकल्प के रूप में किसानों को पराली को खेत में ही रोटावेटर या हैप्पीसीडर द्वारा भूमि में मिला देना, मल्चर, सुपर सीडर, रीपर कम्बाइंडर जैसे यंत्रों का उपयोग करना, पराली से कम्पोस्ट, चारा, बायोगैस निर्माण हेतु उपयोग, सुपर सीडर से पराली में सीधी गेहूं दलहनी फसलों की बोनी करना जैसे उपायों को अपनाने हेतु प्रेरित किया जाए, जिससे किसानों की लागत एवं समय की बचत होती है।
धान-गेहूं के फसली चक में यदि धान की पराली को खेतों में ही रहने दिया जाऐ तो गेहूं की फसल में बढ़ोत्तरी होती है, जमीन की सेहत अच्छी होती है व खाद की खपत भी कम होती है। हैप्पी सीडर/ सुपर सीडर से खेतों में ही पराली का उपयोग करने से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। धान की कटाई के बाद पराली को बिना खेतों से निकाले, गेहूं की बुबाई हैप्पी सीडर मशीन द्वारा की जा सकती है। इस मशीन से धान की पराली को बिना जलाए ही गेहूं की बुबाई हो जाती है। अत: आप अपने विकास खण्डों में मैदानी स्तर के अमले के माध्यम से ग्राम पंचायतों में किसानों को पराली प्रबंधन का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करते हुए किसानों को जागरुक करना सुनिश्चित करें।
Sunday, April 5
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